श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग क्यों हे तीनो लोको में प्रथम पूजनीय

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999152_573140329394102_1380538461_nजय श्री महाकाल
वन्दे देव उमापतिम सुरगुरुं वन्दे जगत् कारणं,वन्दे पन्नग भूषणं मृग्धरम वन्दे पशूनाम्पतिम !वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनम वन्दे मुकुंदप्रियम,वन्दे भक्त जनाश्रयम च वरदम वन्दे शिवम् शंकरं !!
मृत्तुन्जय महाकाल त्राहिमाम शरणागतः , जन्म मृत्यु जरा व्याधि पीड़ितो कर्म बंधनाह !! आकाशे तारका लिंगम , पाताले हात्केश्वारह मृत्युरर्लोके महाकाले , लिंगम त्रियम नमोस्तुते !
अवन्तिकायाम विहिव्तारम मुक्ति प्रदायनाय च सज्जनाम, अकाल मृत्तुर परिरक्शनाय, वन्दे महाकाल महा सुरेश्वरम !!
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव वन्दनार्थ मृत्तुर्मुक्षीय मामृतात !!
कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम !
सदा वसंतम हृदया रविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि !!!
तत पुरुषाय विध्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय
दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥
वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्री शैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम् ॥
केदारे हिगवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् ।
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बंक गौतमी तटे ॥
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने ।
सेतुबन्धे च रामेशं घृष्णेशंच शिवालये ॥
एतानि ज्योतिर्लिंगानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।
जन्मान्तर कृत पापं स्मरणेन विनश्यति॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
-विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ 5 ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥
करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ 7 ॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
-विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥
अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
-द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ 12 ॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः
शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥
भगवान शिव के 108 नाम —-
१- ॐ भोलेनाथ नमः
२-ॐ कैलाश पति नमः
३-ॐ भूतनाथ नमः
४-ॐ नंदराज नमः
५-ॐ नन्दी की सवारी नमः ६-ॐ ज्योतिलिंग नमः
७-ॐ महाकाल नमः
८-ॐ रुद्रनाथ नमः
९-ॐ भीमशंकर नमः
१०-ॐ नटराज नमः
११-ॐ प्रलेयन्कार नमः १२-ॐ चंद्रमोली नमः
१३-ॐ डमरूधारी नमः
१४-ॐ चंद्रधारी नमः
१५-ॐ मलिकार्जुन नमः
१६-ॐ भीमेश्वर नमः
१७-ॐ विषधारी नमः १८-ॐ बम भोले नमः
१९-ॐ ओंकार स्वामी नमः
२०-ॐ ओंकारेश्वर नमः
२१-ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः
२२-ॐ विश्वनाथ नमः
२३-ॐ अनादिदेव नमः २४-ॐ उमापति नमः
२५-ॐ गोरापति नमः
२६-ॐ गणपिता नमः
२७-ॐ भोले बाबा नमः
२८-ॐ शिवजी नमः
२९-ॐ शम्भु नमः ३०-ॐ नीलकंठ नमः
३१-ॐ महाकालेश्वर नमः
३२-ॐ त्रिपुरारी नमः
३३-ॐ त्रिलोकनाथ नमः
३४-ॐ त्रिनेत्रधारी नमः
३५-ॐ बर्फानी बाबा नमः ३६-ॐ जगतपिता नमः
३७-ॐ मृत्युन्जन नमः
३८-ॐ नागधारी नमः
३९- ॐ रामेश्वर नमः
४०-ॐ लंकेश्वर नमः
४१-ॐ अमरनाथ नमः ४२-ॐ केदारनाथ नमः
४३-ॐ मंगलेश्वर नमः
४४-ॐ अर्धनारीश्वर नमः
४५-ॐ नागार्जुन नमः
४६-ॐ जटाधारी नमः
४७-ॐ नीलेश्वर नमः ४८-ॐ गलसर्पमाला नमः
४९- ॐ दीनानाथ नमः
५०-ॐ सोमनाथ नमः
५१-ॐ जोगी नमः
५२-ॐ भंडारी बाबा नमः
५३-ॐ बमलेहरी नमः ५४-ॐ गोरीशंकर नमः
५५-ॐ शिवाकांत नमः
५६-ॐ महेश्वराए नमः
५७-ॐ महेश नमः
५८-ॐ ओलोकानाथ नमः
५४-ॐ आदिनाथ नमः ६०-ॐ देवदेवेश्वर नमः
६१-ॐ प्राणनाथ नमः
६२-ॐ शिवम् नमः
६३-ॐ महादानी नमः
६४-ॐ शिवदानी नमः
६५-ॐ संकटहारी नमः ६६-ॐ महेश्वर नमः
६७-ॐ रुंडमालाधारी नमः
६८-ॐ जगपालनकर्ता नमः
६९-ॐ पशुपति नमः
७०-ॐ संगमेश्वर नमः
७१-ॐ दक्षेश्वर नमः ७२-ॐ घ्रेनश्वर नमः
७३-ॐ मणिमहेश नमः
७४-ॐ अनादी नमः
७५-ॐ अमर नमः
७६-ॐ आशुतोष महाराज नमः
७७-ॐ विलवकेश्वर नमः ७८-ॐ अचलेश्वर नमः
७९-ॐ अभयंकर नमः
८०-ॐ पातालेश्वर नमः
८१-ॐ धूधेश्वर नमः
८२-ॐ सर्पधारी नमः
८३-ॐ त्रिलोकिनरेश नमः ८४-ॐ हठ योगी नमः
८५-ॐ विश्लेश्वर नमः
८६- ॐ नागाधिराज नमः
८७- ॐ सर्वेश्वर नमः
८८-ॐ उमाकांत नमः
८९-ॐ बाबा चंद्रेश्वर नमः ९०-ॐ त्रिकालदर्शी नमः
९१-ॐ त्रिलोकी स्वामी नमः
९२-ॐ महादेव नमः
९३-ॐ गढ़शंकर नमः
९४-ॐ मुक्तेश्वर नमः
९५-ॐ नटेषर नमः ९६-ॐ गिरजापति नमः
९७- ॐ भद्रेश्वर नमः
९८-ॐ त्रिपुनाशक नमः
९९-ॐ निर्जेश्वर नमः
१०० -ॐ किरातेश्वर नमः
१०१-ॐ जागेश्वर नमः १०२-ॐ अबधूतपति नमः
१०३ -ॐ भीलपति नमः
१०४-ॐ जितनाथ नमः
१०५-ॐ वृषेश्वर नमः
१०६-ॐ भूतेश्वर नमः
१०७-ॐ बैजूनाथ नमः १०८-ॐ नागेश्वर नमः
सप्तपुरियो में प्रमुख उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी हें, जिसे अवंतिका, विशाला, पद्मावती, कनकश्रुंगा, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णशृंगा,अमरावती, भोगवती, हिरण्यवती, नभिदेश, कुशस्थली, भी कहा गया है । उज्जयिनी भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही । यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही । इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।
……………….आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
……………….भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥
जहाँ महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है । बताया जाता है, वही धरा का केन्द्र है –
……………….नाभिदेशे महाकालोस्तन्नाम्ना तत्र वै हर: ।
बहुधा पुराणों में महाकाल की महिमा वर्णित है। भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकाल की भी प्रतिष्ठा हैं । सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जैन मे महाकाल, डाकिनी में भीमशंकर, परली मे वैद्यनाथ, ओंकार में ममलेश्वर, सेतुबन्ध पर रामेश्वर, दारुकवन में नागेश, वाराणसी में विश्वनाथ, गोमती के तट पर त्रयम्बक, हिमालय पर केदार और शिवालय में घृष्णेश्वर। महाकाल में अंकितप्राचीन मुद्राएँ भी प्राप्तहोती हैं ।
उज्जयिनी में महाकाल की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है । शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई । महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकार रुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।
महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। महाकाल के इस ज्योतिर्लिंग की पूजा अनजाने काल से प्रचलित है और आज तक निरंतर है। पुराणों में महाकाल की महिमा की चर्चा बार-बार हुई है। शिवपुराण के अतिरिक्त स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में भगवान् महाकाल का भक्तिभाव से भव्य प्रभामण्डल प्रस्तुत हुआ है। जैन परम्परा में भी महाकाल का स्मरण विभिन्न सन्दर्भों में होता ही रहा है।
महाकवि कालिदास ने अपने रघुवंश और मेघदूत काव्य में महाकाल और उनके मन्दिर का आकर्षण और भव्य रुप प्रस्तुत करते हुए उनकी करते हुए उनकी सान्ध्य आरती उल्लेखनीय बताई। उस आरती की गरिमा को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया था।

……………….महाकाल मन्दिरेर मध्ये
……………….तखन, धीरमन्द्रे, सन्ध्यारति बाजे।
महाकवि कालिदास ने जिस भव्यता से महाकाल का प्रभामण्डल प्रस्तुत किया उससे समूचा परवर्ती बाड्मय इतना प्रभावित हुआ कि प्राय: समस्त महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने जब भी उज्जैन या मालवा को केन्द्र में रखकर कुछ भी रचा तो महाकाल का ललित स्मरणअवश्य किया।
चाहे बाण हो या पद्मगुप्त, राजशेखर हो अथवा श्री हर्ष, तुलसीदास हो अथवा रवीन्द्रनाथ। बाणभट्ट के प्रमाण से ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध के समकालीन उज्जैन के राजा प्रद्योत के समय महाकाल का मन्दिर विद्यमान था। कालिदास के द्वारा मन्दिर का उल्लेख किया गया।
पंचतंत्र, कथासरित्सागर, बाणभट्ट से भी उस मन्दिर की पुष्टि होती है।
समय -समय पर उस मन्दिर का जीर्णोंद्धार होता रहा होगा। क्योंकि उस परिसर से ईसवीं पूर्व द्वितीय शताब्दी के भी अवशेष प्राप्त होते हैं।
दसवीं शती के राजशेखर ं ग्यारहवी शती के राजा भोज आदि ने न केवल महाकाल का सादर स्मरण किया, अपितु भोजदेव ने तो महाकाल मन्दिर को पंचदेवाय्रान से सम्पन्न भी कर दिया था। उनके वंशज नर वर्मा ने महाकाल की प्रशस्त प्रशस्ति वहीं शिला पर उत्कीर्ण करवाई थी। उसके ही परमार राजवंश की कालावधि में 1235 ई में इल्तुतमिश ने महाकाल के दर्शन किये थे।
मध्ययुग में महाकाल की भिन्न-भिन्न ग्रंथों में बार-बार चर्चा हुई।
18वीं सदी के पूर्वार्द्ध मेेराणोजी सिन्धिया के मंत्री रामचन्द्रराव शेणवे ने वर्तमन महाकाल का भव्य मंदिर पुननिर्मित करवाया। अब भी उसके परिसर का यथोचित पुननिर्माण होता रहता है।
महाकालेश्वर का विश्व-विख्यात मन्दिर पुराण-प्रसिद्ध रुद्र सागर के पश्चिम में स्थित रहा है।
महाशक्ति हरसिद्धि माता का मन्दिर इस सागर के पूर्व में स्थित रहा है, आज भी है।
इस संदर्भ में महाकालेश्वर मन्दिर के परिसर में अवस्थित कोटि तीर्थ की महत्ता जान लेना उचित होगा। कोटि तीर्थ भारत के अनेक पवित्र प्राचीन स्थलों पर विद्यमान रहा है।
सदियों से पुण्य-सलिला शिप्रा, पवित्र रुद्र सागर एवं पावन कोटि तीर्थ के जल से भूतभावन भगवान् महाकालेश्वर के विशाल ज्योतिर्लिंग का अभिषेक होता रहा है। पौराणिक मान्यता है कि अवन्तिका में महाकाल रूप में विचरण करते समय यह तीर्थ भगवान् की कोटि ;पाँव के अंगूठेद्ध से प्रकट हुआ था।
उज्जयिनी का महाकालेश्वर मन्दिर सर्वप्रथम कब निर्मित हुआ था, यह कहना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन हैं। पुराणों में संदर्भ आये हैं कि इसकी स्थापना प्रजापिता ब्रह्माजी के द्वारा हुई थी। हमें संदर्भ प्राप्त होते हैं कि ईपू छठी सदी में उज्जैन के एक वीर शासक चण्डप्रद्योत ने महाकालेश्वर परिसर की व्यवस्था के लिये अपने पुत्र कुमारसेन को नियुक्त किया था। उज्जयिनी के चौथी – तीसरीसदी ईपू क़े कतिपय आहत सिक्कों पर महाकाल की प्रतिमा का अंकन हुआ है। अनेक प्राचीन काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का उल्लेख आया है।

राजपूत युग से पूर्व उज्जयिनी में जो महाकाल मन्दिर विद्यमान था, उस विषयक जो संदर्भ यत्र-तत्र मिलते हैं, उनके अनुसार मन्दिर बड़ा विशाल एवं दर्शनीय था। उसकी नींव व निम्न भाग प्रस्तर निर्मित थे।
प्रारंभिक मन्दिर काष्ट-स्तंभों पर आधारित था।
गुप्त काल के पूर्व मन्दिरों पर कोई शिखर नहीं होते थे, अत: छत सपाट होती रही। संभवत: इसी कारण रघुवंश में महाकवि कालिदास ने इसे निकेतन का संज्ञा दी है।
इसी निकेतन से नातिदूर राजमहल था। पूर्व मेघ में आये उज्जयिनी के कितना विवरण से भी त्कालीन महाकालेश्वर मन्दिर का मनोहारी विवरण प्राप्त होता है। ऐसा लगता है कि महाकाल चण्डीश्वर का यह मन्दिर तत्कालीन कलाबोध का अद्भुत उदाहरण रहा होगा। एक नगर, के शीर्ष उस नगर को बनाते हों, उसके प्रमुख आराध्य का मन्दिर जिसकी वैभवशाली रहा होगा,इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। मन्दिर कंगूरेनुमा प्राकार व विशाल द्वारों से युक्त रहा होगा। संध्या काल में वहाँ दीप झिलमिलाते थे। विविध वाद्ययंत्रों की ध्वनि से मन्दिर परिसर गूंजता रहता था। सांध्य आरती का दृश्य अत्यंत मनोरम होता था। अलंकृत नर्तकियों से नर्तन ये उपजी नूपुर-ध्वनि सारे वातावरण का सौन्दर्य एवं कलाबोध से भर देती थी। निकटवर्ती गंधवती नदी में स्नान करती हुई ललनाओं के अंगरागों की सुरभि से महाकाल उद्यान सुरभित रहता था। मन्दिर प्रांगण में भक्तों की भीड़ महाकाल की जयकार करती थी। पुजारियों के दल पूजा – उपासना में व्यस्त रहा करते थे। कर्णप्रिय वेद-मंत्र एवं स्तुतियों से वातावरण गुंजित रहता था। चित्रित एवं आकर्षक प्रतिमाएँ इस सार्वभौम नगरी के कलात्मक वैभव को सहज ही प्रकट कर देती थीं।
गुप्त काल के उपरांत अनेक राजवंशों ने उज्जयिनी की धरती का स्पर्श किया। इन राजनीतिक शक्तियों में उत्तर गुप्त, कलचुरि, पुष्यभूति, गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सबने भगवान् महाकाल के सम्मुख अपना शीश झुकाया और यहाँ प्रभूत दान-दक्षिणा प्रदान की। पुराण साक्षी है कि इस काल में अवन्तिका नगर में अनेक देवी-देवताओं ेके मन्दिर, तीर्थस्थल, कुण्ड, वापी, उद्यान आदि निर्मित हुए। चौरासी महादेवों के मन्दिर सहित यहाँ शिव के ही असंख्य मन्दिर रहे।
जहाँ उज्जैन का चप्पा-चप्पा देव – मन्दिरों एवं उनकी प्रतिमाओं से युक्त रहा था, तो क्षेत्राधिपति महाकालेश्वर के मन्दिर और उससे जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के उन्नयन की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इस काल में रचित अनेक काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का बड़ा रोचक व गरिमामय उल्लेख आया है। इनमें बाणभट्ट के हर्षचरित व कादम्बरी, श्री हर्ष का नैपधीयचरित, पुगुप्त का नवसाहसांकचरित मुख्य हैं।परमार काल में निर्मित महाकालेश्वर का यह मन्दिर शताब्दियों तक निर्मित होता रहा था। परमारों की मन्दिर वास्तुकला भूमिज शैली की होती थी। इस काल के मन्दिर के जो भी अवशेष मन्दिर परिसर एवं निकट क्षेत्रों में उपलब्ध हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मन्दिर निश्चित ही भूमिज शैली में निर्मित था। इस शैली में निर्मित मन्दिर त्रिरथ या पंचरथ प्रकार के होते थे। शिखर कोणों से ऊरुशृंग आमलक तक पहुँचते थे। मुख्य भाग पर चारों ओर हारावली होती थी। यह शिखर शुकनासा एवं चैत्य युक्त होते थे जिनमें अत्याकर्षक प्रतिमाएँ खचित रहती थीं। क्षैतिज आधार पर प्रवेश द्वार, अर्ध मण्डप, मण्डप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा-पथ होते थे। ये अवयव अलंकृत एवं मजबूत स्तम्भों पर अवस्थित रहते थे। विभिन्न देवी -देवताओं, नवगृह, अप्सराओं, नर्तकियों, अनुचरों, कीचकों आदि की प्रतिमाएँ सारे परिदृश्य को आकर्षक बना देती थीं। इस मन्दिर का मूर्ति शिल्प विविधापूर्ण था। शिव की नटराज, कल्याणसुन्दर, रावणनुग्रह, उमा-महेश्वर, त्रिपुरान्तक, अर्धनारीश्वर, गजान्तक, सदाशिव, अंधकासुर वध, लकुलीश आदि प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश, पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु, नवग्रह, सूर्य, सप्त-मातृकाओं की मूर्तियाँ यहाँ खचित की गइ थीं। नयचन्द्र कृत हम्मीर महाकाव्य से ज्ञात होता है कि रणथम्बौर के शासक हम्मीर ने महाकाल की पूजा-अर्चना की थी।
उज्जैन में मराठा राज्य अठारहवीं सदी के चौथे दशक में स्थापित हो गया था। पेशवा बाजीराव प्रथम ने उज्जैन का प्रशासन अपने विश्वस्त सरदार राणोजी शिन्दे को सौंपा था। राणोजी के दीवान थे सुखटनकर रामचन्द्र बाबा शेणवी। वे अपार सम्पत्ति के स्वामी तो थे किन्तु नि:संतान थे। कई पंडितों एवं हितचिन्तकों के सुझाव पर उन्होंने अपनी सम्पत्ति को धार्मिक कार्यों में लगाने का संकल्प लिया। इसी सिलसिले में उन्होंने उज्जैन में महाकाल मन्दिर का पुनर्निर्माण अठारहवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक में करवाया।
Mahakaleshwar Jyotirlinga is one of the most famous Hindu temples dedicated to Lord Shiva and is one of the twelve Jyotirlingams, which are supposed to be the most sacred abodes of Shiva. It is located in the ancient city of Ujjain in the state of Madhya Pradesh, India. The temple is situated on the side of the Rudra Sagar lake. The presiding deity, Shiva in the lingam form is believed to be Swayambhu, deriving currents of power (Shakti) from within itself as against the other images and lingams that are ritually established and invested with mantra-shakti.
The temple
The idol of Mahakaleshwar is known to be dakshinamurti, which means that it is facing the south. This is a unique feature, upheld by the tantric shivnetra tradition to be found only in Mahakaleshwar among the 12 Jyotirlingas. The idol of Omkareshwar Mahadev is consecrated in the sanctum above the Mahakal shrine. The images of Ganesh, Parvati and Karttikeya are installed in the west, north and east of the sanctum sanctorum. To the south is the image of Nandi, the vehicle of Lord Shiva. The idol of Nagchandreshwar on the third storey is open for darshan only on the day of Nag Panchami. The temple has five levels, one of which is underground. The temple itself is located in a spacious courtyard surrounded by massive walls near a lake. The shikhar or the spire is adorned with sculptural finery. Brass lamps light the way to the underground sanctum. It is believed that prasada (holy offering) offered here to the deity can be re-offered unlike all other shrines.[1]
Mahakaleshwar Jyotirlinga
The presiding deity of time, Shiva, in all his splendor, reigns eternally in the city of Ujjain. The temple of Mahakaleshwar, its shikhar soaring into the sky, an imposing façade against the skyline, evokes primordial awe and reverence with its majesty. The Mahakal dominates the life of the city and its people, even in the midst of the busy routine of modern preoccupations, and provides an unbreakable link with ancient Hindu traditions. On the day of Maha Shivaratri, a huge fair is held near the temple, and worship goes on through the night.[2]
History
According to the Puranas, the city of Ujjain was called Avantika and was famous for its beauty and its devotional epicenter. It was also one of the primary cities where students went to study holy scriptures. According to legend, there was a ruler of Ujjain called Chandrasen, who was a pious devotee of Lord Shiva and worshipped him all the time. One day, a farmer’s boy named Shrikhar was walking on the grounds of the palace and heard the King chant the Lord’s name and rushed to the temple to start praying with him. However, the guards removed him by force and sent him to the outskirts of the city near the river Kshipra. Rivals of Ujjain, primarily King Ripudaman and Kind Singhaditya of the neighboring kingdoms decided to attack the Kingdom and take over its treasures around this time. Hearing this, Shrikhar started to pray and the news spread to a priest named Vridhi. He was shocked to hear this and upon the urgent pleas of his sons, he started to pray to Lord Shiva inside the river Kshipra. The Kings chose to attack and were successful; with the help of the powerful demon Dushan, who was blessed by Lord Brahma to be invisible, they plundered the city and attacked all the devotees of Lord Shiva.
Upon hearing the pleas of His helpless devotees, Lord Shiva appeared in his Mahakal form and destroyed the enemies of King Chandrasen. Upon the request of his devotees Shrikhar and Vridhi, Lord Shiva agreed to reside in the city and become the chief deity of the Kingdom and take care of it against its enemies and to protect all His devotees. From that day on, Lord Shiva resided in His light form as Mahakal in a Lingam that was formed on its own from the powers of the Lord and His consort, Parvati. The Lord also blessed his devotees and declared that people who worshipped Him in this form would be free from the fear of death and diseases. Also, they would be granted worldly treasures and be under the protection of the Lord himself.[3]
Transport
The temple is located in the heart of Ujjain, at a distance of two kilometers from the Ujjain railway station. It is accessible by state-operated tempos, auto-rickshaws or private taxis.

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