सिंहस्थ महाकुंभ क्षिप्रा तट उज्जयिनी, अद्भुत अलौकिक आनंदौल्लास पूर्ण अकल्पनीय अवर्णननीय महापर्व महोत्सव

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सिंहस्थ महाकुंभ क्षिप्रा तट उज्जयिनी, अद्भुत अलौकिक आनंदौल्लास का महापर्व महोत्सव , एक नए आयाम के साथ संपन्न होने जा रहा हे, लोग जुटते चले कारवाँ बनता गया की तर्ज पर, विश्व का सबसे बड़ा महा आयोजन , जिसमे की भी लोग युगो युगों से धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना और विश्व का कल्याण होने की कामना करते , सनातन आस्था विश्वास और असीम श्रद्धा लिए , दुनिया भर से स्व् स्फूर्ति से आते रहे हे , का एक अत्याधुनिक हाईटेक स्वर्णिम इतिहास लिखने जा रहा हे!
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संभवतः यह विश्व सभ्यता का अब तक का सबसे बड़ा मानव जमावड़ा भी हे, जो प्रवचन सत्संग अनुष्ठान, साधना उपासना आराधना के साथ ही चिंतन मंथन और मनन समाहित कर विश्व समस्याओ के समाधान के मार्ग , सन्मार्ग की और अग्रसर करने में उत्प्रेरित करते रहे हे, यह स्वयं ही सनातन भारतीय दर्शन का गूढ़ तत्व बताती हे , जो कि अपने आप में शाश्वत सार्थकता लिए हुए हे!
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मानव शाश्त्री समाज विज्ञानी भी इसका अपने दृष्टिकोण से शोध अध्धयन करेंगे, इतिहास वेत्ता इसका मूल्यांकन अपने तरह से करेंगे,उज्जयिनी वासी का और विदेशी दोनों के अपने नजरिये हे,
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प्रबंध और प्रशासन के इतिहास में मानव सभ्यता का अब तक का सवार्धिक चुनोतिपूर्ण दायित्व रहा हे, विश्व के टॉप प्रोफेशनल टेक्नोक्रैट भी इतनी बड़ी मेगा इवेंट का प्रबंधन का अनुभव सामर्थ्य नहीं रखते, वो कार्य हमारे नेतृत्व , प्रशासन ने सफल कर दिखाया।
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इसकी लगातार पैनी समीक्षा , समुदाय द्वारा की गयी, इसकी सफलता लोकतांत्रिक अवधारणा का भी परीक्षण हे, प्रत्येक बिंदु कार्य में जनमानस सीधा जुड़ा रहा, लोगो ने लगातार इसकी गतिविधियों में संव्यवहार रखा, इसकी विषयवस्तू का कोई और उदाहरण नहीं होने से हर मानदंड का मूल्यांकन केवल खुद उसी के अपने माप से ही हो सकता हे, चुनोती को मशीनरी ने मिशनरी मोड पर पूरा किया !
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जिसने जिस तरह भी सिंहस्थ मनाया या जिया वो सदा सदा के लिए अविस्मर्णीय है, सभी ने अपनी भूमिका निवाही ही, कौन ऊपर गया कोन नीचे गया , ये सव समय की धारा में विलीन हो जाता हे, जो शेष रहता हे वो हे अमृतत्व, संसार को सनातन धर्म का मानवता के कल्याण का पुनीत दिव्य सन्देश !
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बैशाख पूर्णिमा का महा अमृत स्नान में अर्धरात्रि से अर्धरात्रि तक 100 लाख से अधिक तीर्थयात्रियो , भक्तो ने डुबकी लगायी , सिलसिला निरंतर जारी रहा ,
त्रिवेणी से कालियादेह महल से आगे तक जहाँ शिप्रा तीरे घाट थे और जहाँ कोई व्यवस्था नही भी थी , चहुँ और अथाह जन समुद्र, अमृत स्नान कर साक्षात् महादेव ब्रह्मा और विष्णु सहीत समस्त देव शक्तियों, ऋषि मुनिओ के दर्शन कर , समेत स्वयं को धन्य मान रहा था ,
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शिव की नगरी उज्जयिनी जेसे और विस्तृत सजीव हो अपने श्रीविशाला, प्रतिकल्पा स्वरूप में आ, अवंतिका नामानुरूप सबका रक्षण संरक्षण करती रही, यही देवभूमि महाकाल की नगरी उज्जयिनी और अमृतमयी मोक्षदायिनी माँ क्षिप्रा की विशेषता हे,सबको महादेव महाकाल के शिवतत्व की प्रत्यक्ष अनुभूति हुयी , प्रकृति के दिव्य मनोरम आनंदमयी स्वरुप के दर्शनों को प्रणाम,
ज्ञान विज्ञानं के साक्षात्कार को प्रणाम !
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अमृत मंथन के महापर्व पर होने जा रही, प्रचलित दिव्य पूर्णाहुति की अकल्पनीय अवर्णनीय सफलता की मंगलकामनाये,बधाईया, जय महाकाल !!
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श्री महाकालेश्वर की कृपा से, सिंहस्थ महाकुम्भ क्षिप्रा तट उज्जैन अलौकिक अद्भुत आनंदोल्लास और सनातन दिव्य चैतन्यता विश्व् को प्रदान कर संपन्न हुआ, बधाईया , देव ऋषि साधु संत श्रद्धालु भक्त और अन्यान्य प्राणी सूक्ष्म तत्व, बाबा महाकाल की उज्जयिनी में पुनः पधारे , ॐ पूर्णः मदः पूर्ण मिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते , पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते ।।

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