मोदी सरकार में कृषि और किसानों की स्थिति और बदतर हुई, किसान नोटबन्दी का जबाब वोटबन्दी से देने के इरादे में

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भले ही मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कार्यकाल में नए तरीके से गणना करने पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के काल की तुलना में बेहतर है, लेकिन संप्रग के कार्यकाल में पिछले  4 साल की तुलना में कृषि वृद्धि दर बेहतर रही है। 
ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि संप्रग-2 के पहले चार साल यानी 2009-10 से 2012-13 में कृषि और संबंधित गतिविधियों की औसत सालाना वृद्धि दर करीब 3.9 प्रतिशत थी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग-2 के पहले 4 साल में वृद्धि दर 2.52 प्रतिशत रही है। लगातार दो साल तक पड़े सूखे की वजह से राजग के शुरुआती दो साल 2014 और 2015 में कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित रहा, क्योंकि खेती बारिश पर बहुत निर्भर है। 

पूरे संप्रग के कार्यकाल में 2005-06 से 2012-13 के बीच औसत सालाना कृषि वृद्धि दर जीडीपी समर्थित सिरीज के आंकड़ों के मुताबिक 3.8 प्रतिशत रही, यह भी राजग-2 के पहले 4 साल की तुलना में ज्यादा है। हालांकि इन दो कार्यकालोंं की ठीक से तुलना नहींं की जा सकती क्योंकि एक चक्र 9 साल का है और दूसरा महज 4 साल का है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 2009 में पड़े भयानक सूखे के बाद 2010-11 में वृद्धि दर बहुत ही शानदार 8.8 प्रतिशत रही। सामान्य मॉनसून और कम आधार होने की वजह से इस साल वृद्धि दर बेहतर रही थी। 

पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘संप्रग-1 और संप्रग-2 के कुछ साल ऐसे थे, जब वैश्विक जिंस बाजार में तेजी थी, जिसकी वजह से घरेलू बाजार में भी जिंसों के दाम बढ़े। लोगों के हाथ में नकदी थी, जिसने कृषि क्षेत्र की वृद्धि में अहम भूमिका निभाई।’ उन्होंने कहा कि वहीं जब राजग सरकार ने कार्यभार संभाला तो न सिर्फ वैश्विक बाजार सुस्त था, बल्कि लगातार पड़े सूखे के कारण घरेलू स्थिति भी खराब हो गई।

हुसैन ने कहा, ‘उसके बाद नोटबंदी और जीएसटी का दोहरा झटका लगा, जिसे मांग पर असर पड़ा और कुल मिलाकर मंदी आ गई।’ आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि न सिर्फ सालाना औसत कृषि वृद्धि संप्रग के कार्यकाल में अच्छी थी बल्कि किसानों को मेहनताना भी बेहतर मिला। 2017-18 में स्थिर मूल्य और मौजूदा मूल्य (जो अनुमानित है और उसके आधार पर खाद्य महंगाई का अनुमान लगाया गया है) पर कृषि जीडीपी महज 1.05 प्रतिशत रही। इस तरह से देखें तो 2019 के आम चुनाव में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है क्योंकि कृषि उत्पादों के दाम में गिरावट और ग्रामीण आमदनी कम होना बड़ा चुनावी मुद्दा हो सकता है। 

विपक्षी दल कांग्रेस अपने कार्यकाल में हुई तेज कृषि वृद्धि दर और राजग के काल में कम वृद्धि दर को भुनाने को तैयार है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कृषि उत्पादों के दाम कम रहने की वजह से कृषि संकट है, जो सत्तासीन भाजपा के भविष्य निर्धारण में अहम है। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के सोनी गांव के एक किसान लखीचंद सिनाम ने कहा, ‘कुछ साल पहले तक खुले बाजार में सोयाबीन 4000 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे नहीं आता था, भले ही खराब गुणवत्ता का हो। बहरहाल पिछले 2-3 साल से बेहतरीन गुणवत्ता के  लिए दाम 3,500 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं मिल रहा है।’ 

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