बॉलीवुड में बढ़ रहा है ‘बायोपिक’ का बुख़ार

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नई दिल्ली: इस हफ्ते रिलीज़ हुई फिल्म शाहिद की बेहद तारीफ़ हो रही है. शाहिद एक ‘बायोपिक’ है, यानि एक किरदार की असली ज़िंदगी की घटनाओं पर आधारित एक फिल्म. ये फिल्म शाहिद आज़मी नाम के एक वकील की कहानी है जिसने 26-11 मुंबई हमले के आरोपी फहीम अंसारी का अदालत में बचाव किया था. बाद में शाहिद आज़मी की हत्या कर दी गई थी. ये बायोपिक फिल्म बेहद सशक्त और गंभीर तरीके से अपनी कहानी कह जाती है.

शाहिद को सिनेमाघरों में रिलीज़ करने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि सबको लगता था कि विषय गंभीर है, ये किसी सेलेब्रिटी की कहानी भी नहीं है, फिल्म में मसाला नहीं है और सबसे बड़ी बात इसमें कोई बड़ा स्टार भी नहीं है. हिंदी सिनेमा में गंभीर बायोपिक बनाने का चलन नहीं है. अगर बायोपिक बनाने का फैसला होता भी है, तो सबसे पहले यही सोचा जाता है कि फिल्म में कौन सा स्टार काम करेगा. हालांकि पिछले कुछ सालों में स्थिति थोड़ी बदलती दिखाई दे रही है.

इरफ़ान खान की ‘पान सिंह तोमर’, विद्या बालन की ‘द डर्टी पिक्चर’ और फरहान अख्तर की  ‘भाग मिल्खा भाग’ की कामयाबी से इंडस्ट्री को बायोपिक का नया फॉर्मूला तो मिला ही, एक भेड़चाल भी शुरू हो गई. अब हर बड़ा स्टार किसी बायोपिक में काम करना चाहता है. फिल्मों की चर्चा भी होती है और अवॉर्ड फंक्शन में भी उस स्टार की वाह-वाह हो जाती है. बायोपिक का पहला उसूल होता कि उसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन हमारी फिल्म इंडस्ट्री उसूलों से कोसों दूर है.

जिन फिल्मों के नाम ऊपर दिए गए है उनमें दो सुपर हिट फिल्में हैं ‘द डर्टी पिक्चर’ और  ‘भाग मिल्खा भाग’. कहने को ये दोनों बायोपिक हैं लेकिन हिंदी सिनेमा के मुताबिक इनमें सारे मसाले भी मौजूद हैं. मनोरंजन के नाम पर यहां मिल्खा सिंह नाचते-गाते और रोमांस करते नज़र आते हैं. फिल्म में कई बातें तथ्यों से परे हैं. यहां तक कि खेल में मिली उनकी हार के पीछे भी अजीबोगरीब कारण बताए गए हैं.

‘द डर्टी पिक्चर’ में भी अभिनेत्री सिल्क स्मिता की ज़िंदगी के तश्यों के साथ काफ़ी छेड़छाड़ की गई. फिल्म बनाने वाले यही कहते रहते हैं कि चूंकि इन फिल्मों को बनाने में करोड़ों खर्च होते हैं. अगर इसमें मसाला-मनोरंजन नहीं होगा तो दर्शक इन्हें क्यों देखने आएंगे. यानि सब कुछ दर्शकों के मत्थे मढ़ दिया गया.

आगे भी बॉक्सर मैरी कॉम पर बनने वाले बायोपिक में सुपर स्टार प्रियंका चोपड़ा काम कर रही हैं. रणबीर कपूर किशोर कुमार के बायोपिक में काम करने की हामी भर चुके हैं. अक्षय कुमार को लेकर अभिनेता दारा सिंह का बायोपिक और शाहरुख को लेकर हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद पर बायोपिक बनाने की चर्चा हो रही है. क्रिकेटर अज़हरुद्दीन के बायोपिक में सैफ अली खान को लेने की ख़बर भी आई थी.

यानि देखा जाए तो इंडस्ट्री के सारे सुपर स्टार्स भी बायोपिक के फॉर्मूले को अपने अंदाज़ में भुनाने में लगे हैं. ज़ाहिर है इन सारे बायोपिक्स में नाच-गाना भी होगा और सुपर स्टार्स का अंदाज़ भी. निर्माता-निर्देशक ये कहकर पल्ला झाड़ लेंगे कि दर्शक इन सुपर स्टार्स का स्टाइल देखने ही तो आते हैं. उसके बिना तो फिल्में चलेगी ही नहीं. सवाल ये है कि अगर आम बॉलीवुड फिल्मों वाला मसाला ही दिखाना है तो फिर किसी शख्सियत की असली ज़िंदगी की कहानी, गंभीर घटनाओं के साथ खिलवाड़ करना क्या सही है? अगर बात सिर्फ दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींचकर पैसे कमाने की है तो दंबग, चेन्नई एक्सप्रेस, बॉस जैसी फिल्में ही बनाई जाएं.

बायोपिक ऐसी शख्सियतों पर बनती हैं जिन्होने अपने जीवन में विलक्षण काम किए. आम इंसान होते हुए भी कठिन हालातों पर जीत हासिल की. ऐसी फिल्मों में कहानी और तथ्य ही सबसे ऊपर होने चाहिए. ऐसा बिलकुल नहीं है कि गंभीर फिल्में दर्शक पसंद ही नहीं करते. अगर कहानी में दम है तो फिल्म चलती है. पानसिंह तोमर में कहानी कहने का अंदाज़ दिलचस्प था, इसीलिए फिल्म खूब चली. अब शाहिद जैसे छोटे बजट की फिल्म की भी हर तरह तारीफ़ हो रही है. दर्शक मैच्योर हो रहे हैं. अब वो हिम्मतवाला और बेशरम जैसे घिसे-पिटे फॉर्मूलों वाली फिल्मों को बुरी तरह नकार देते हैं.

ये सही समय है जब अच्छी, सशक्त फिल्में अपनी जड़ें जमा सकती हैं. खासतौर पर असली ज़िंदगी के रंगो से सजी बेहतरीन बायोपिक्स. जिस तरह का मनोरंजन किसी समाज में पसंद किया जाता है, वो उस समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है. अच्छे स्तर के समाज में मनोरंजन का स्तर भी ऊपर उठते रहना चाहिए.

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