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भारत का यह बॉर्डर है तालिबान-पाक झगड़े की जड़, 132 साल बाद भी धधक रही आग
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन को लेकर हाल के दिनों विवाद अफगानिस्तान के हमले में कई पाकिस्तानी सैनिक मरे, तनाव की जड़ में है 132 साल पुराना FATA विवाद,

अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर बढ़ते तनाव की जड़ में है 132 साल पुराना FATA विवाद. 1893 में बनी डूरंड लाइन आज भी दोनों देशों के बीच असहमति का कारण है. हालिया झड़पें TTP के हमले और पाकिस्तानी हवाई कार्रवाई से शुरू हुईं, जिनमें दर्जनों सैनिक मारे गएअविभाजित
अफगानिस्तान के डूरंड रेखा को अस्वीकार करने का मुख्य कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक है। अफगान सरकार का मानना है कि यह समझौता अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान पर ब्रिटिश दबाव में हस्ताक्षर करवाया गया था।
Pakistan Taliban Tension: अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सरहद पर इन दिनों तनाव चरम पर है. 9 अक्टूबर को पाकिस्तान ने काबुल, खोस्त, जलालाबाद और पक्तिका में हवाई हमले किए. पाकिस्तान का दावा था कि उसका निशाना तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का सरगना नूर वली महसूद था. पाकिस्तान ने कहा कि महसूद अफगानिस्तान में छिपा है और अफगान तालिबान उसे पनाह दे रहे हैं. लेकिन ये हमले नाकाम रहे और महसूद बच निकला. इसके बाद 11 और 12 अक्टूबर को डूरंड लाइन पर दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई. पाकिस्तान ने दावा किया कि उसके 23 सैनिक मारे गए, जबकि अफगानिस्तान ने कहा कि 58 पाकिस्तानी जवान ढेर हुए. बुधवार सुबह तड़के पाकिस्तान की फौज ने एक बार फिर अफगानिस्तान पर हमला किया. खास तौर पर कंधार के स्पिन बोलदक जिले को निशाना बनाया. तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने कहा कि इस हमले में 12 आम नागरिक मारे गए और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए. इसके जवाब में अफगान फौज ने पलटवार किया, जिसमें कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. अफगान बलों ने उनके ठिकाने और चौकियाँ कब्जे में लीं, हथियार और टैंक ज़ब्त किए और उनकी कई सैन्य सुविधाएँ तबाह कर दीं. सुबह 8 बजे तक हालात पर काबू पा लिया गया था. दोनों देशों ने एक-दूसरे पर सीमा उल्लंघन और आतंकी पनाह देने का आरोप लगाया. 1947 में जब पाकिस्तान बना, तो मोहम्मद अली जिन्ना ने इन कबीलों से वादा किया, ‘हम आपको वैसा ही रहने देंगे.’ पाकिस्तान ने FCR को बरकरार रखा. FATA में पाकिस्तान का संविधान पूरी तरह लागू नहीं होता था. यहाँ न चुनाव होते थे, न स्कूल-अस्पताल बनते थे. लोग बहुत गरीब थे. बिजली, पानी, सड़क कुछ नहीं. लेकिन पाकिस्तान ने FATA को ऐसा ही क्यों रखा? क्योंकि ये एक बफर जोन था. FATA ऐसा इलाका था जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच था. FATA की वजह से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक दूरी रहती थी. अगर अफगानिस्तान कुछ करता, तो वो FATA में उलझ जाता.
फाटा
1979 में जब सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो पाकिस्तान और अमेरिका ने FATA को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. हजारों मुजाहिदीन यहाँ आए. FATA में ट्रेनिंग कैंप बने, हथियार रखे गए, और मुजाहिदीन अफगानिस्तान में सोवियत के खिलाफ लड़े. FATA की वजह से पाकिस्तान सुरक्षित रहा. फिर 1990 के दशक में जब तालिबान बने, तो भी FATA से उन्हें मदद मिली. लेकिन हर चीज के दो पहलू होते हैं.
FATA ने पाकिस्तान को बचाया, लेकिन ये एक खतरनाक जगह भी बन गया. यहां अल-कायदा जैसे आतंकी संगठन पनपे. 2007 में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान बना, जिसने पाकिस्तान के खिलाफ ही बगावत शुरू कर दी. FATA में आतंकवाद का अड्डा बन गया. स्कूल उडाए गए, लोग मारे गए. 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया, तो तालिबान और अल-कायदा के लोग FATA में छिप गए. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने भी यही किया. वो FATA से पाकिस्तानी फौज पर हमले करते, और फिर अफगानिस्तान भाग जाते.
पाकिस्तान की कब से बढ़ी मुसीबत?
अब आते हैं 2018 की बात पर. उस साल पाकिस्तान ने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने FATA को खैबर पख्तूनख्वा सूबे में मिला लिया. कुछ पश्तून कबीले चाहते थे कि FATA को अलग सूबा बनाया जाए. लेकिन वो बफर जोन, जो FATA की शक्ल में था, अब खत्म हो गया. अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सरहद सीधे सट गई. कोई बीच की जमीन नहीं बची. पहले अगर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान कुर्रम में हमला करता, तो पाकिस्तान कहता, ‘ये FATA का आंतरिक मामला है.’ लेकिन अब कुर्रम खैबर पख्तूनख्वा का जिला है. हमला सीधे पाकिस्तान पर होता है. यानी अब दोनों देश आमने-सामने आ गए हैं.


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