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नई दिल्ली.CJI बीआर गवई ने रविवार को अपने कार्यकाल के अंतिम दिन अपने आवास में पत्रकारों से बात कर रहे थे.CJI बीआर गवई ने रविवार को अपने कार्यकाल के अंतिम दिन कहा कि कॉलेजियम सिस्टम बना रहना चाहिए, क्योंकि यह जनता का न्यायपालिका पर भरोसा मजबूत करता है। CJI अपने आवास में पत्रकारों से बात कर रहे थे, इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कहा- सुप्रीम कोर्ट का उस केस में 20 नवंबर का फैसला पूरी तरह संतुलित है, जो गवर्नरों और राष्ट्रपति के बिलों पर निर्णय लेने की समय सीमा से जुड़ा था। CJI गवई ने कहा-
इस फैसले में गवर्नर और राष्ट्रपति पर बिलों के निपटारे की कोई तय समय सीमा नहीं लगाई गई, वहीं यह भी साफ कर दिया गया कि वे किसी बिल को अनिश्चित काल तक पेंडिंग नहीं रख सकते।
52 वें CJI गवई का कार्यकाल रविवार को समाप्त हो गया। शुक्रवार यानी 20 नवंबर को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपना अंतिम कार्यदिवस पूरा किया था। अगले CJI जस्टिस सूर्यकांत होंगे। वे सोमवार यानी 24 नवंबर को 53 वें CJI पद की शपथ लेंगे।
cji गवई ने कहा
संविधान में सत्ता के अलग-अलग क्षेत्रों यानि सेपरेशन ऑफ पावर का सिद्धांत है। इसलिए कोर्ट संविधान में लिखी नहीं गई समय सीमा खुद से नहीं जोड़ सकता। हमने टाइमलाइन को हटाया जरूर है, लेकिन यह भी कहा है कि गवर्नर बिल पर अनंत समय तक बैठे नहीं रह सकते। बहुत ज्यादा देरी होने पर न्यायिक समीक्षा संभव है।
बिल पर फैसला तुरंत न हो पाने की कई परिस्थितियां हो सकती हैं। कानून बनाने की शक्ति विधायिका के पास है और गवर्नर इस प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक रोक नहीं सकते।
जज सरकार और नागरिकों को देखकर नहीं सिर्फ केस के दस्तावेजों के आधार पर फैसला करता है। किसी फैसले में सरकार जीते या हारे, यह कोर्ट की स्वतंत्रता का पैमाना नहीं हो सकता।
इधर, जब मीडिया ने दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से पैसे मिलने को लेकर सवाल पूछा तो CJI ने टालते हुए कहा कि यह मामला फिलहाल संसदीय समिति के विचाराधीन है, इसलिए वह इस पर कुछ नहीं कहेंगे।

CJI गवई 40 साल की यात्रा से संतुष्ट
CJI बीआर गवई का शुक्रवार को आखिरी वर्किंग डे पर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना बताते हुए कहा कि 2021 के ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स कानून की प्रमुख धाराओं को रद्द करने का फैसला इसी सिद्धांत पर आधारित था। गवई ने कहा कि उनका सफर संविधान तथा उनके माता-पिता के संस्कारों ने उन्हें यहां तक पहुंचाया।उन्होंने कहा, “40 साल पहले शुरू हुई मेरी यात्रा से मैं बेहद संतुष्ट हूं।”

4 नवंबर- संविधान में न्याय और समानता के सिद्धांत
CJI बीआर गवई ने 4 नवंबर को कहा था कि लोकतंत्र के तीनों अंग कार्यपालिका, अदालत और संसद ये तीनों मिलकर जनता के कल्याण के लिए काम करते हैं, कोई भी अकेले काम नहीं कर सकता। स्वतंत्रता, न्याय और समानता के सिद्धांत भारतीय संविधान में हैं, जो हर संस्था की कार्यप्रणाली का आधार हैं।
उन्होंने कहा- न्यायपालिका के पास न तो तलवार की ताकत है और न ही शब्दों की। ऐसे में जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। कार्यपालिका की भागीदारी के बिना न्यायपालिका और कानूनी शिक्षा को पर्याप्त बुनियादी ढांचा देना कठिन है।

11 अक्टूबर: डिजिटल युग में लड़कियां सबसे ज्यादा असुरक्षित, टेक्नॉलॉजी शोषण का जरिया बनी
मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने कहा था कि डिजिटल दौर में लड़कियां नई तरह की परेशानियों और खतरों का सामना कर रही हैं। टेक्नॉलॉजी सशक्तिकरण नहीं, शोषण का जरिया बन गई है। लड़कियों के लिए आज ऑनलाइन हैरेसमेंट, साइबर बुलिंग, डिजिटल स्टॉकिंग, निजी डेटा के दुरुपयोग और डीपफेक तस्वीरें बड़ी चिंता बन गई हैं।
4 अक्टूबरः बुलडोजर एक्शन का मतलब कानून तोड़ना
चीफ जस्टिस (CJI) बीआर गवई ने कहा था कि भारतीय न्याय व्यवस्था रूल ऑफ लॉ यानी (कानून के शासन) से चलती है, इसमें बुलडोजर एक्शन की जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी आरोपी के खिलाफ बुलडोजर चलाना कानून की प्रक्रिया को तोड़ना है।

CJI बोले-न्याय की सक्रियता जरूरी लेकिन यह आतंक न बने, नागरिकों की रक्षा करने कोर्ट को आगे आना पड़ता है
चीफ जस्टिस बीआर गवई ने 17 नवंबर को कहा कि देश में न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) जरूरी है, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। यह सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद (ज्यूडिशियल टेररिज्म) में नहीं बदलनी चाहिए.


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