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देश में तीन नए आपराधिक कानून यानि भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 आज एक जुलाई 2024 से लागू गए हैं। 

ब्रिटिश कालीन राजद्रोह कानून से मिली मुक्ति

नई संहिता के जरिए जिन औपनिवेशिक ब्रिटिश कालीन कानूनों से मुक्ति पाई गई है और आज के परिपेक्ष में जिन व्यावहारिक कानूनों को लाया गया है उनमें राजद्रोह कानून का हटना है। हालांकि राजद्रोह की जगह अब देशद्रोह को स्थान दिया गया है लेकिन इसका परिप्रेक्ष्य और मकसद बिलकुल अलग और स्पष्ट है।

राजद्रोह की जगह अब देशद्रोह को दिया गया स्थान 

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में सरकार के खिलाफ बोलना, प्रदर्शन करना या भावनाएं व्यक्त करना अपराध की श्रेणी में था लेकिन अब ऐसा नहीं है और सरकार की आलोचना करने के देश के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार सर्वथा सुरक्षित रहेंगे।

स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक हितों ने औपनिवेशिक हितों की ली जगह 

बताना चाहेंगे भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 देशद्रोह कानून को फिर से परिभाषित करती है। आईपीसी की धारा 124 ए सरकार के खिलाफ कृत्यों को संबोधित करती थी और इसमें दोषी को तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान था जबकि भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कार्यों पर केंद्रित है। स्पष्ट है कि स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक हितों ने औपनिवेशिक हितों की जगह ले ली है।

राजद्रोह और देशद्रोह कानून में क्या अंतर ?

आईपीसी की धारा 124 ए के मुताबिक सरकार के प्रति नफरत या अवमानना पैदा करने वाली अभिव्यक्ति अपराध में शामिल थी लेकिन भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 सशस्त्र विद्रोह, विनाशकारी गतिविधियों और अलगाववादियों गतिविधियों के लिए सजा का प्रावधान करती है। इसमें दोषी को 7 साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जाएगा।

नए कानून के तहत सरकारी नीतियों और कार्यों की आलोचना पर सजा का प्रावधान नहीं

यानि ऐसे कृत्यों के लिए सजा जो भारत की अखंडता को प्रत्यक्ष रूप से खतरा पहुंचाने वाले दिखते हों। नए कानून के तहत सरकारी नीतियों और कार्यों की आलोचना पर सजा का प्रावधान नहीं है। कानून में इरादे की आवश्यकता को जोड़ा गया है जिससे प्रावधान की सीमा और विस्तृत हो गई है।

सजा के भय के बगैर विचारों के व्यक्त करने के नागरिकों के अधिकार को रखा सुरक्षित 

नए कानून में सजा के भय के बगैर विचारों के व्यक्त करने के नागरिकों के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए उन गतिविधियों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाहियों को सुनिश्चित किया गया है जो राष्ट्र के लिए खतरा उत्पन्न करती है। जाहिर है कि ये संतुलन लोकतांत्रिक समाज को बरकरार रखने के लिए बेहद अहम है। 

इस प्रकार अंग्रेजों के जमाने के राजद्रोह कानून से देश को अब मुक्ति मिली है और नया कानून देशद्रोह की बात करता है यानि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत कवच देते हुए देशद्रोह पर नकेल।

राजद्रोह कानून का इतिहास
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के तहत आता है, जो सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष पैदा करने या करने के प्रयास को दंडित करता है। इस अपराध में आजीवन कारावास या तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। यह एक गैर-जमानती अपराध है और इसके तहत व्यक्ति को सरकारी नौकरी, पासपोर्ट और विदेश यात्रा से वंचित किया जा सकता है। 
राजद्रोह कानून की मुख्य बातें
    • परिभाषा: आईपीसी की धारा 124A के अनुसार, जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों, संकेतों या दृश्य चित्रण के माध्यम से भारत में कानूनी तौर पर स्थापित सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष भड़काता है, तो उसे दंडित किया जाएगा।
    • सजा:
        • आजीवन कारावास के साथ जुर्माना।
    • तीन साल तक की कैद के साथ जुर्माना।
  • गैर-जमानती: यह एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है, जिसका अर्थ है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती है।
  • अधिकारों पर प्रतिबंध:
    • सरकारी नौकरी से वंचित किया जा सकता है।
    • पासपोर्ट के बिना रहना पड़ सकता है।
    • जरूरत पड़ने पर अदालत में पेश होना आवश्यक है।
  • अपवाद:
    • सरकार की किसी विशेष नीति या कार्य की आलोचना करना, यदि वह बिना घृणा, अवमानना या असंतोष पैदा किए, केवल उसे वैध तरीकों से बदलने के उद्देश्य से की गई हो, तो वह राजद्रोह नहीं है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: इस कानून का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों जैसे महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ किया गया था। महात्मा गांधी ने इसे “नागरिक की स्वतंत्रता को दबाने” वाला कानून कहा था।
  • वर्तमान स्थिति: 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की समीक्षा होने तक इसके मामलों को स्थगित करने का निर्देश दिया था। 
  • मई 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे प्रथमतः अ संवैधानिक मानते हुए, एक अंतरिम आदेश में देश भर में धारा 124A के तहत लंबित आपराधिक मुकदमों और न्यायालयी कार्यवाही को रोकते हुए धारा 124A के उपयोग को निलंबित कर दिया था।

राजद्रोह कानून:

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
    • राजद्रोह कानून को 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड में अधिनियमित किया गया था, उस समय विधि निर्माताओं का मानना था कि सरकार के प्रति अच्छी राय रखने वाले विचारों को ही केवल अस्तित्त्व में या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिये, क्योंकि गलत राय सरकार तथा राजशाही दोनों के लिये नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न कर सकती थी।
      • इस कानून का मसौदा मूल रूप से वर्ष 1837 में ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले द्वारा तैयार किया गया था, लेकिन वर्ष 1860 में भारतीय दंड सहिता (IPC) लागू करने के दौरान इस कानून को IPC में शामिल नहीं किया गया।
    • धारा 124A को 1870 में जेम्स स्टीफन द्वारा पेश किये गए एक संशोधन द्वारा जोड़ा गया था जब उन्होंने अपराध से निपटने के लिये एक विशिष्ट खंड की आवश्यकता महसूस की थी।
      • वर्तमान में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के तहत राजद्रोह एक अपराध है।
  • वर्तमान में राजद्रोह कानून:
    • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A:
      • यह कानून राजद्रोह को एक ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित करता है जिसमें ‘किसी व्यक्ति द्वारा भारत में कानूनी तौर पर स्थापित सरकार के प्रति मौखिक, लिखित (शब्दों द्वारा), संकेतों या दृश्य रूप में घृणा अथवा अवमानना या उत्तेजना पैदा करने का प्रयत्न किया जाता है।
        • विद्रोह में वैमनस्य और शत्रुता की भावनाएँ शामिल होती हैं। हालाँकि इस धारा के तहत घृणा या अवमानना फैलाने की कोशिश किये बगैर की गई टिप्पणियों को अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता है।
        • बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि भाषण को देशद्रोही करार देने से पहले उसके वास्तविक इरादे को ध्यान में रखा जाना चाहिये।
  • दंड:
    • राजद्रोह गैर-जमानती अपराध है। राजद्रोह के अपराध में तीन वर्ष से लेकर उम्रकैद तक की सज़ा हो सकती है और इसके साथ ज़ुर्माना भी लगाया जा सकता है।
    • इस कानून के तहत आरोपित व्यक्ति को सरकारी नौकरी प्राप्त करने से रोका जा सकता है।
      • आरोपित व्यक्ति को पासपोर्ट के बिना रहना होता है, साथ ही आवश्यकता पड़ने पर उसे न्यायालय में पेश होना ज़रूरी है।

राजद्रोह कानून का महत्त्व:

  • उचित प्रतिबंध
    • भारत का संविधान अपने नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
      • हालाँकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सरकार यह सुनिश्चित करने के लिये कुछ परिस्थितियों में इसे प्रतिबंधित कर सकती है ताकि इसका दुरुपयोग न हो।
    • इन प्रतिबंधों को उचित माना जाता है और संविधान के अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित किया गया है।
  • एकता और अखंडता बनाए रखना:
    • राजद्रोह कानून सरकार को राष्ट्र-विरोधी, अलगाववादी और आतंकवादी तत्त्वों का मुकाबला करने में मदद करता है।
  • राज्य की स्थिरता को बनाए रखना:
    • यह चुनी हुई सरकार को हिंसा और अवैध तरीकों से उखाड़ फेंकने के प्रयासों से बचाने में मदद करता है।
    • कानून द्वारा स्थापितजी सरकार का निरंतर अस्तित्त्व राज्य की स्थिरता के लिये एक अनिवार्य शर्त है।

संबंधित मुद्दे:

  • औपनिवेशिक युग का अवशेष:
    • औपनिवेशिक प्रशासकों ने ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने वाले लोगों को रोकने के लिये राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया।
  • संविधान सभा का मत:
    • संविधान सभा संविधान में राजद्रोह को शामिल करने के लिये सहमत नहीं थी क्योंकि सदस्यों को लगा कि यह बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम कर देगा।
    • उन्होंने तर्क दिया कि राजद्रोह कानून को विरोध करने के लोगों के वैध और संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकार को दबाने के लिये एक हथियार में बदल दिया जा सकता है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों का दमन:
    • मुख्य रूप से राजद्रोह कानून के कठोर और गणनात्मक उपयोग के कारण भारत को एक निर्वाचित निरंकुशता के रूप में वर्णित किया जा रहा है।

देशद्रोह के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के विगत निर्णय:

  • वर्ष 1950 की शुरुआत में रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि “सरकार की आलोचना उसके प्रति असंतोष या बुरी भावनाओं को उत्तेजित करती है, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करना एक न्यायोचित आधार के रूप में नहीं माना जाना चाहिये जैसे कि सुरक्षा को कमज़ोर करना या राज्य सत्ता को उखाड़ फेंकना।”
  • इसके बाद दो उच्च न्यायालयों- तारा सिंह गोपीचंद बनाम राज्य (1951) मामले में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय तथा राम नंदन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने IPC की धारा 124A घोषित की जो मुख्य रूप से देश में असंतोष को दबाने के लिये औपनिवेशिक आकाओं के लिये एक उपकरण था एवं प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
  • केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) मामले में देशद्रोह पर फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के पहले के फैसलों को खारिज कर दिया और IPC की धारा 124A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। हालाँकि न्यायालय ने इसके दुरुपयोग की गुंज़ाइश को सीमित करने का प्रयास किया।

हाल के विकास:

  • फरवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक राजनीतिक नेता और छह वरिष्ठ पत्रकारों को कथित रूप से ट्वीट करने एवं असत्यापित समाचार साझा करने हेतु उनके खिलाफ दर्ज कई राजद्रोह FIR से सुरक्षित किया।
  • जून 2021 में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा दो तेलुगू (भाषा) समाचार चैनलों को जबरदस्ती की कार्रवाई से बचाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह की सीमा को परिभाषित करने पर ज़ोर दिया।
  • जुलाई 2021 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें राजद्रोह कानून पर फिर से विचार करने की मांग की गई थी।
  • न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक कानून जो ‘सरकार के प्रति असंतोष’ जैसे शब्दों की अस्पष्ट और असंवैधानिक परिभाषाओं के आधार पर अभिव्यक्ति का अपराधीकरण करता है, वह अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर उचित प्रतिबंध नहीं है।
  • इस तरह का कानून अभिव्यक्ति पर एक द्रुतशीतन प्रभाव उत्पन्न करता है, जिसका अर्थ है कि लोग सरकार द्वारा दंडित किये जाने के डर से स्वयं को सेंसर या सीमित करेंगे अथवा अपनी राय व्यक्त करने से परहेज करेंगे।

मत

  • सरकार या कार्यपालिका ही देश नहीं है अर्थात शासन की आलोचना या निंदा या अपमान , राज्य का देश का अपमान नहीं हो सकता अतः कानून निरस्त किया जाना चाहिए था.
  • भारत की क्षेत्रीय अखंडता और देश की संप्रभुता से संबंधित मुद्दों  हेतु राजद्रोह की परिभाषा को परिवर्तित  किया जाकर देश द्रोह होना   चाहिये।

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