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सुप्रीमकोर्ट ने पूछा  कि क्या EC संदेहास्पद नागरिक के मामले में जांच करने से रोका गया है, और क्या ऐसी पूछताछ उसकी संवैधानिक शक्तियों से बाहर है, CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने दलीलें सुनीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलीलें रखीं।

स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

इस दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि चुनाव आयोग (EC) वोटर्स को शक की निगाह से देखते हुए संदिग्ध पड़ोसी या पुलिसकर्मी की भूमिका नहीं निभा सकता।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने दलीलें सुनीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलीलें रखीं।

वकील राजू रामचंद्रन ने कहा-

  • EC का काम लोगों की मदद करना है ताकि वे आसानी से वोट डाल सकें।
  • BLO जैसे अधिकारियों को सिर्फ शक के आधार पर लोगों की जांच करने का अधिकार देना गलत है।
  • किसी का नाम संदेह में वाटर्स लिस्ट से हटाना, नागरिकता पर सवाल उठाने जैसा है।
  • “माइग्रेंट” शब्द को कई बार गलत तरीके से अवैध प्रवासी समझ लिया जाता है, जबकि लोग अक्सर नौकरी या काम के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।

SIR हर साल होने वाला काम नहीं

इस पर जस्टिस बागची ने कहा, माइग्रेशन का अर्थ सिर्फ घरेलू नहीं है, लोग रोजगार की तलाश में जाते हैं। ब्रेन ड्रेन भी माइग्रेशन ही है। उन्होंने बताया कि कोलकाता के कई IT प्रोफेशनल्स दक्षिण भारत में काम के लिए जाते हैं।CJI ने भी श्रमिकों के बड़े पैमाने पर पलायन का उदाहरण देते हुए कहा, उत्तर भारत में ट्रेनें बिहार के किसानों से भरी रहती हैं। वे पंजाब पहुंचते-पहुंचते वो रोने लगते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कई मजदूर बाद में पंजाब में बस भी गए हैं।

CJI ने अपने हालिया हैवलॉक द्वीप दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि वहां 25,000 की आबादी में लगभग 22,000 लोग प्रवासी हैं। कोर्ट ने कहा SIR प्रक्रिया 20 साल बाद हो रही है, इसलिए बहुत ज्यादा तकनीकी आपत्तियां नहीं देखी जा सकतीं। यह हर साल होने वाला काम नहीं है।जब याचिकाकर्ताओं ने प्रक्रिया को अनावश्यक पूछताछ वाला बताया, तो जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि अदालत के सवाल केवल बेहतर प्रतिक्रिया जानने के लिए थे, किसी निष्कर्ष के संकेत नहीं।

9 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों के चयन पर सवाल

रामचंद्रन ने पूछा कि क्यों सिर्फ 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों- जैसे छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान और यूपी को चुना गया? उन्होंने कहा कि लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार में तेजी से शहरीकरण या पलायन होने का दावा आसान अनुमान और लापरवाही है। छत्तीसगढ़ में, जहां फिलहाल चुनाव नहीं हैं, वहां जल्दी-जल्दी SIR कराने पर उन्होंने कहा, “इतने संवेदनशील राज्य में जल्दबाजी न्यायिक समीक्षा की मांग करती है।”

नए मामलों पर रोक

सुनवाई की शुरुआत में CJI सूर्यकांत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मुद्दे पर अब कोई नई याचिका स्वीकार न करे।उन्होंने कहा, “कई लोग सिर्फ पब्लिसिटी के लिए आ रहे हैं। अब और याचिकाओं की जरूरत नहीं।” मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होगी।

सुप्रीमकोर्ट ने पूछा  कि क्या EC संदेहास्पद नागरिक के मामले में जांच करने से रोका गया है, और क्या ऐसी पूछताछ उसकी संवैधानिक शक्तियों से बाहर है।

इलेक्शन कमीशन (EC) की ओर से पेश हुए सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो EC के पास पुलिस को अपने डेप्युटेशन पर लेने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं होगा, जो राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है ,जस्टिस बागची ने कहा कि पोल पैनल, इलेक्शन प्रोसेस शुरू होने तक पुलिस को अपने अधिकार क्षेत्र में नहीं ले सकता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में चल रहे SIR 2.0 में लगे BLOs और दूसरे अधिकारियों को ‘धमकाए जाने’ को गंभीरता से लिया. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा, “वह ऐसे मामलों को उसके ध्यान में लाए, वरना इससे अराजकता फैलेगी, सुप्रीम कोर्ट ने  कहा, “BLOs के काम में रुकावट और कोऑपरेशन की कमी के मामले हमारे ध्यान में लाए हम राज्य सरकारों को कार्रवाही के निर्देश देंगे.

याचिकाकर्ताओ ने गुरुवार को देश में चल रही मतदाता सूची सघन पुनरीक्षण (एसआइआर) प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि शक के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाना, नागरिकता निलंबित करने के समान है। ये दलीलें तमिलनाडु सीपीआइ (एम) के राज्य सचिव पी.शनमुगम की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दीं।

इन दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि एसआइआर में प्रक्रियागत पहलुओं को ज्यादा नहीं देखा जा सकता। अगर वो हर साल मतदाता सूची को कॉपी पेस्ट करना शुरू कर दें तब क्या होगा? हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि वह कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे, बस पूछ रहे हैं। मामले में 16 दिसंबर को फिर सुनवाई होगी.

सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जोयमाल्या बाग्ची की पीठ आजकल एसआइआर की वैधानिकता पर सुनवाई कर रही है। तमिलनाडु सीपीआइ (एम) के राज्य सचिव पी. शनमुगम की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि चुनाव आयोग का मुख्य संवैधानिक उद्देश्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सुनिश्चित करना है। यानी संविधान के मुताबिक चुनाव आयोग का काम सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को सुविधाजनक बनाना है।

अब देखना होगा कि चुनाव आयोग अपनी भूमिका को कैसे देखता है क्योंकि उसी के अनुसार वह काम करेगा। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के लिए मतदान के तीन न प्रमुख योग्यता कारक हैं। उम्र, निवास और नागरिकता। तीनों का समान महत्व है यदि ये शर्तें पूरी होती हैं तो चुनाव आयोग का काम है उन लोगों को वोट देने में सक्षम बनाना जो इन शर्तों को पूरा करते हैं।

राजू रामचंद्रन ने कहा कि यहां उद्देश्य गैर- नागरिकों को हटाना नहीं है। लेकिन शक की भावना से काम शुरू करना मुद्दा है। इसका नतीजा क्या होगा। उन्होंने कहा कि शक के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाना नागरिकता निलंबित करने की शक्ति देने जैसा है।

लेकिन उच्चतम कोर्ट   ने इन दलीलों पर कहा कि एसआइआर को प्रक्रियागत पहलुओं पर बहुत ज्यादा नहीं देखा जा सकता। यह बात दिमाग में रखनी होगी कि वे 20 साल बाद ये काम कर रहे हैं। एसआइआर वार्षिक कार्यक्रम नहीं हो सकता। अगर वो साल दर साल मतदाता सूची को कापी पेस्ट करना शुरू कर दें तब क्या होगा।

उच्चतम कोर्ट पीठ ने स्पष्ट करते हुए कहा कि वह कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे बस पूछ रहे हैं। रामचंद्रन ने धारा 21(3) का हवाला देते हुए कहा कि यह कहती है कि कारण दर्ज करने होंगे।


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