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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में (नवंबर 2024) एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सरकार हर निजी संपत्ति को ‘सामुदायिक संसाधन’ मानकर उसका अधिग्रहण नहीं कर सकती, जिससे संविधान के अनुच्छेद 39(b) की व्याख्या सीमित हुई और 46 साल पुराने फैसले को पलटा, जिसने समाजवादी विचारधारा के तहत सरकार को सभी निजी संसाधनों के अधिग्रहण का अधिकार दिया था; अब निजी संपत्ति के अधिकार सुरक्षित हैं, लेकिन जनहित में कुछ संसाधनों का अधिग्रहण हो सकता है, बशर्ते यह उचित और सीमित हो, न कि हर निजी संपत्ति पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण

मुख्य बिंदु और सुप्रीम कोर्ट के आदेश:
  1. ‘सामुदायिक संसाधन’ की सीमित व्याख्या: कोर्ट ने कहा कि हर निजी संपत्ति को ‘सामुदायिक संसाधन’ (Material Resource of the Community) नहीं माना जा सकता, जिसे सरकार सार्वजनिक भलाई के लिए ले सके।
  2. पिछला फैसला रद्द: 1978 के उस फैसले को पलट दिया गया जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाली संपत्तियों को राज्य द्वारा अधिग्रहित किया जा सकता है, खासकर समाजवादी विचारों से प्रेरित कानूनों के तहत।
  3. अनुच्छेद 39(b) और 300A का संतुलन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 39(b) (राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत) को अनुच्छेद 300A (संपत्ति के अधिकार) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, ताकि निजी संपत्ति के अधिकारों की रक्षा हो सके।
  4. सरकार की शक्ति सीमित: अब सरकार हर निजी संपत्ति पर कब्जा नहीं कर सकती। वह केवल उन संसाधनों का अधिग्रहण कर सकती है जो वास्तव में समुदाय के भौतिक संसाधन हैं और सार्वजनिक भलाई के लिए आवश्यक हैं, न कि केवल ‘आम भलाई’ के नाम पर हर संपत्ति को ले लेना।
  5. संविधान पीठ का फैसला: यह फैसला 9 जजों की संविधान पीठ ने 7:2 के बहुमत से सुनाया, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने की। 
निजीकरण पर प्रभाव (निजी संपत्ति के संदर्भ में):
  • निजी संपत्ति की सुरक्षा: यह फैसला निजी संपत्ति के मालिकों के लिए एक बड़ी राहत है और उनके अधिकारों को मजबूत करता है।
  • अधिग्रहण की सीमा: सरकार अब मनमाने ढंग से निजी संपत्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकती। अधिग्रहण के लिए ठोस कारण और जनहित की वास्तविक आवश्यकता होनी चाहिए।
  • समाजवादी विचारधारा पर रोक: कोर्ट ने “कठोर आर्थिक सिद्धांत” को खारिज किया जो राज्य को निजी संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण देता था, और आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक और निजी निवेश के सह-अस्तित्व पर जोर दिया। 
संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट ने निजी संपत्ति के अधिकारों को संरक्षित करते हुए, सरकार के अधिग्रहण के अधिकार पर सीमाएं तय की हैं, ताकि निजी स्वामित्व और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बना रहे। 

निजी संपत्तियों पर अधिकार की सीमा रेखा खींची

शीर्ष अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में ही राज्य निजी संपत्तियों को ले सकते हैं या दावा कर सकते हैं। यानी सभी निजी संपत्तियों को सामुदायिक संसाधन नहीं माना जा सकता जिन्हें राज्य सार्वजनिक भलाई के लिए अपने अधीन ले लें। सुप्रीम कोर्ट के इस दूरगामी प्रभाव वाले फैसले ने जहां सरकार के निजी संपत्तियों पर अधिकार की सीमा रेखा खींची है, वहीं उस वर्ग की सोच को भी झटका दिया है जो कहते हैं कि सभी संपत्तियों का सर्वे करके उन्हें बराबरी से वितरित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का मंगलवार का फैसला कहीं न कहीं निजी संपत्ति पर व्यक्ति के अधिकार पर मुहर लगाता है।

प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय पीठ ने महाराष्ट्र के एक मामले में संविधान पीठ को भेजे गए कानूनी सवालों का जवाब देते हुए यह फैसला सुनाया है। नौ न्यायाधीशों ने 429 पेज के कुल तीन अलग-अलग फैसले दिए हैं जिसमें प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने स्वयं और छह अन्य न्यायाधीशों हृषिकेश राय, जेबी पार्डीवाला, मनोज मिश्रा, राजेश बिंदल, सतीश चंद्र शर्मा और अगस्टीन जार्ज मसीह की ओर से फैसला दिया है जिसमें उपरोक्त व्यवस्था दी है। जबकि जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बहुमत के फैसले से आंशिक सहमति जताई है। जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने बहुमत से असहमति जताने वाला फैसला दिया है।

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 39(बी) की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 39(बी) के तहत आने वाले संसाधन के बारे में जांच कुछ विशेष चीजों पर आधारित होनी चाहिए। इसमें संसाधनों की प्रकृति, विशेषताएं, समुदाय की भलाई पर संसाधन का प्रभाव, संसाधनों की कमी तथा ऐसे संसाधनों के निजी हाथों में केंद्रित होने के परिणाम जैसे कारक हो सकते हैं। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित पब्लिक ट्रस्ट के सिद्धांत भी उन संसाधनों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं जो समुदाय के भौतिक संसाधन के दायरे में आते हैं।

जस्टिस धूलिया ने अपने अलग फैसले में बहुमत से पूर्ण असहमति जताई

जस्टिस नागरत्ना ने अलग से दिए फैसले में बहुमत से आंशिक सहमति जताई, लेकिन जस्टिस धूलिया ने अपने अलग फैसले में बहुमत से पूर्ण असहमति जताते हुए कहा कि भौतिक संसाधनों को कैसे नियंत्रित और वितरित किया जाए, यह देखना संसद का विशेषाधिकार है। उन्होंने कहा कि निजी स्वामित्व वाले संसाधन कब और किस तरह भौतिक संसाधनों की परिभाषा में आते हैं, यह न्यायालय द्वारा घोषित नहीं किया जा सकता।

यह मामला विशेष तौर पर संविधान के अनुच्छेद 31सी और 39(बी) और (सी) की व्याख्या से जुड़ा था। मुख्य मामला मुंबई से आया था और मामले में मुख्य याचिकाकर्ता भी प्रापर्टी ओनर्स एसोसिएशन एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य था।

 

 


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