Share

भारत में “मूल स्पर्शी प्रतिनिधित्व लोकतंत्र” (Grassroots Democracy) का तात्पर्य स्थानीय स्तर पर, यानी गाँव और शहर के निचले स्तरों पर लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी और निर्णय लेने की शक्ति से है। यह भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे की नींव माना जाता है, जो केंद्रीय और राज्य स्तर की सरकारों के अतिरिक्त एक तीसरे स्तर की सरकार की स्थापना करता है। 

संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान में मूल स्पर्शी लोकतंत्र की स्थापना मुख्य रूप से 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से की गई थी:

  • 73वां संशोधन अधिनियम, 1992: इसने भारतीय संविधान में भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची को जोड़ा। इसने पंचायती राज व्यवस्था (ग्राम पंचायत, ब्लॉक समिति और जिला परिषद) को संवैधानिक दर्जा दिया।
    • अनुच्छेद 243A ग्राम सभा की स्थापना का प्रावधान करता है, जिसमें गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं। यह प्रत्यक्ष भागीदारी और सामाजिक अंकेक्षण (social audit) की मूल लोकतांत्रिक सभा है।
    • अनुच्छेद 40, जो कि राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है, राज्यों को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश देता है, जिसे इस संशोधन के माध्यम से कानूनी रूप दिया गया।
  • 74वां संशोधन अधिनियम, 1992: इसने संविधान में भाग IX-A और बारहवीं अनुसूची को जोड़ा, जिसने शहरी स्थानीय स्वशासन (नगरपालिकाएं, नगर परिषदें और नगर निगम) को संवैधानिक मान्यता दी। 
ये प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि स्थानीय स्तर पर निर्वाचित निकाय हों, उन्हें कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियां और अधिकार दिए जाएं और नियमित चुनाव हों। 

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों के माध्यम से लोकतंत्र और संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, हालांकि “मूल स्पर्शी प्रतिनिधित्व” पर सीधे तौर पर कुछ विशिष्ट निर्णयों की बजाय, कोर्ट ने इसके अंतर्निहित सिद्धांतों को मजबूत किया है:
  • केशवानंद भारती मामला (1973): इस ऐतिहासिक निर्णय ने “संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) को प्रतिपादित किया। कोर्ट ने माना कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन इसके मूल ढांचे को नहीं बदल सकती। यह सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, जिसमें प्रतिनिधि लोकतंत्र भी शामिल है, की रक्षा करता है।
  • एस.आर. बोम्मई मामला (1994): इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्य संबंधों और संघवाद के सिद्धांतों को मजबूत किया। इसने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राज्य सरकारों को अनुच्छेद 356 के तहत मनमाने ढंग से बर्खास्त करने पर अंकुश लगाया, जिससे संघीय ढांचे और अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय स्तरों पर लोकतंत्र की स्थिरता सुनिश्चित हुई।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव: सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा माना है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 से संबंधित निर्णयों ने चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को बनाए रखने में मदद की है।
भारतीय  संविधान 73वें और 74वें संशोधनों के माध्यम से मूल स्पर्शी लोकतंत्र की स्थापना करता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों को किसी भी विधायी या कार्यकारी कार्रवाई से कमजोर न किया जाए। 
संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं और 74 वें संविधान संशोधन द्वारा नगर पालिका लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

मूल संविधान में भाग-9 के अंतर्गत पंचायती राज से संबंधित उपबंधों की चर्चा (अनुच्छेद 243) की गई है । भाग-9 में‘पंचायतें’ नामक शीर्षक के तहत अनुच्छेद 243-243ण (243-243O) तक पंचायती राज से संबंधित उपबंध हैं।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 (जी) उपबंधित करता है कि संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान कर सकता है जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक समझे

अनुच्छेद 243 यह भी कहता है कि इस भाग के उपबंधों के अनुसार प्रत्येक राज्य में नगर पालिकाओं का गठन किया जाएगा। किसी संक्रमणशील क्षेत्र के लिए अर्थात ग्रामीण क्षेत्र से नगरी क्षेत्र में संक्रमणशील क्षेत्र के लिए एक नगर पंचायत चाहे जो नाम हो किसी लघुता क्षेत्र के लिए नगर पालिका परिषद और किसी बड़े नगरी क्षेत्र के लिए नगर निगम नगर की स्थापना ऐसे नगरों के लिए की जाएगी जो ग्रामीण से नगर में परिवर्तित होने की दशा में है। 

अनुच्छेद 243-ट पंचायतों के लिए निर्वाचन से सम्बंधित है। पंचायतों के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण एक राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा, जो राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जायेगा। 

इसी प्रकार अनुच्छेद 243-यक नगरीय निकाय के लिए निर्वाचन से सम्बंधित है । नगरपालिकाओं के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, अनुच्छेद 243-ट में निर्दिष्ट राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा।

त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), पंचायत समिति या जनपद पंचायत (मध्यवर्ती स्तर पर) और ज़िला परिषद या  जिला पंचायत (ज़िला स्तर पर) शामिल हैं।

इसी प्रकार नगरपालिकाओं के तीन स्तर हैं : नगर पंचायत – ऐसे संक्रमणशील क्षेत्रों में गठित की जाती है, जो गाँव से शहरों में परिवर्तित हो रहे हैं; नगरपालिका परिषद – छोटे शहरों अथवा लघु नगरीय क्षेत्रों में गठित किया जाता है; और नगर निगम – बड़े नगरीय क्षेत्रों, महानगरों में गठित की जाती है।

भारतीय संविधान में मूल स्पर्शी प्रतिनिधित्व लोकतंत्र (जमीनी स्तर या ‘ग्रासरूट’ स्तर पर लोकतंत्र) की स्थापना के लिए कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं, जो मुख्य रूप से सत्ता के विकेंद्रीकरण और समावेशी प्रतिनिधित्व पर केंद्रित हैं। 

इसके प्रमुख संवैधानिक प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  • 73वां और 74वां संविधान संशोधन (1992): ये संशोधन भारत में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की नींव हैं।
    • अनुच्छेद 243 (पंचायती राज): 73वें संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वशासन सुनिश्चित हुआ।
    • अनुच्छेद 243W (नगरपालिकाएं): 74वें संशोधन ने शहरी स्थानीय निकायों को शक्तियां और उत्तरदायित्व हस्तांतरित किए。
  • समावेशी प्रतिनिधित्व (आरक्षण):
    • समाज के कमजोर वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पंचायतों और नगरपालिकाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं。
    • महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, जो जमीनी स्तर पर महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देता है।
  • ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A): यह “मूल स्पर्शी” लोकतंत्र का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ गांव के सभी पंजीकृत मतदाता सीधे नीति-निर्माण और विकास कार्यों में भाग लेते हैं。
  • निर्वाचन आयोग और चुनाव:
    • अनुच्छेद 324: संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है।
    • अनुच्छेद 243K और 243ZA: स्थानीय निकायों के चुनाव नियमित रूप से कराने के लिए प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग का गठन अनिवार्य किया गया है。
  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326): यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार रखता है, जो लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है。
  • पेसा (PESA) अधिनियम, 1996: अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए स्थानीय स्वशासन और उनकी पारंपरिक रीति-रिवाजों के संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं。 
ये प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि शासन केवल दिल्ली या राज्यों की राजधानियों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी पहुंच और भागीदारी हो。 

Share