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देश की एकता और अखंडता के लिए धर्मांधता और सांप्रदायिकता को सबसे बड़े खतरों में से एक माना जाता है। 2026 के संदर्भ में, यह समस्या न केवल सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ रही है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय विकास को भी बाधित कर रही है। 

इसके घातक प्रभावों और समाधानों का विवरण नीचे दिया गया है:

देश की एकता के लिए घातक प्रभाव

  • सामाजिक विभाजन: सांप्रदायिकता समाज को “हम बनाम वे” की मानसिकता में बांट देती है, जिससे आपसी विश्वास और भाईचारा खत्म हो जाता है।
  • हिंसा और जान-माल की हानि: सांप्रदायिक दंगों के कारण निर्दोष लोगों की जान जाती है और सार्वजनिक संपत्ति का भारी नुकसान होता है।
  • आर्थिक विकास में बाधा: अशांति और असुरक्षा के माहौल में निवेश घटता है और आर्थिक गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं, जो देश की प्रगति को रोकती हैं।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण: यह धर्मनिरपेक्षता, समानता और न्याय जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करती है और राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देती है।
  • मानसिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव: समुदायों के बीच बढ़ता डर और नफरत अगली पीढ़ियों के मानस पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। 

निपटने के उपाय और समाधान

  • संवैधानिक और कानूनी प्रवर्तन: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A और नए कानूनी प्रावधानों (जैसे मॉब लिंचिंग पर सख्त कानून) का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना।
  • मूल्य-आधारित शिक्षा: स्कूलों और कॉलेजों में शांति, मानवतावाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली शिक्षा अनिवार्य करना ताकि युवा कट्टरपंथ से बच सकें।
  • मीडिया की जिम्मेदारी: भ्रामक खबरों और नफरत फैलाने वाले भाषणों (Hate Speech) पर रोक लगाने के लिए सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया की सख्त निगरानी।
  • सामुदायिक संवाद: विभिन्न धर्मों के बीच आपसी समझ बढ़ाने के लिए ‘शांति समितियों’ और अंतर-धार्मिक संवादों का आयोजन करना।
  • राजनीतिक जवाबदेही: चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं का उपयोग करने वाले नेताओं और दलों पर चुनाव आयोग द्वारा सख्त कार्रवाई करना। 
बढ़ती धर्मांधता से निपटने के लिए सरकार और नागरिक दोनों का जागरूक होना अनिवार्य है ताकि भारत की विविधता में एकता बनी रहे। 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों और विशेष रूप से 2025-2026 में धर्मांधता और सांप्रदायिकता के खिलाफ कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और फ़ैसले दिए हैं, जो देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने पर केंद्रित हैं:

  • धर्मनिरपेक्षता संविधान का ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure): नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों का समान सम्मान है और यह संविधान के मूल ढांचे का एक अभिन्न हिस्सा है।
  • क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता पर सख्त रुख: जुलाई 2025 में एक पीठ (जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची) ने कहा कि क्षेत्रीयता को बढ़ावा देना सांप्रदायिकता जितना ही खतरनाक है क्योंकि दोनों ही देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करते हैं।
  • नफरती भाषण (Hate Speech) पर कार्रवाई: कोर्ट ने दोहराया है कि सांप्रदायिक नफरत फैलाने के प्रयासों से ‘लोहे के हाथ’ (iron hand) से निपटा जाना चाहिए। कोर्ट ने दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड पुलिस को निर्देश दिया है कि वे हेट स्पीच के मामलों में किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिना खुद (suo motu) एफआईआर दर्ज करें।
  • दिल्ली दंगा मामला (2026): 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने माना कि नियोजित व्यवधान और सुनियोजित अशांति पैदा करने के प्रयास ‘आतंकवादी कृत्य’ की श्रेणी में आ सकते हैं, जो देश की सुरक्षा को चुनौती देते हैं।
  • धार्मिक स्थलों और सर्वेक्षणों पर रोक: जनवरी 2026 में एक निर्देश के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को मौजूदा धार्मिक ढांचों के संबंध में सर्वे या कोई भी अंतरिम/अंतिम आदेश पारित करने से अस्थायी रूप से रोक दिया है, ताकि सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे।
  • वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: कोर्ट ने वक्फ कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई है, जिसमें पांच साल के इस्लामी अभ्यास के प्रमाण की आवश्यकता को मनमाना बताया गया है।
न्यायालय ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि बिना भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव के देश की संप्रभुता को खतरा हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों (2024-2026) में धर्मांधता और सांप्रदायिकता से जुड़े मामलों पर कई ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं, जो देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं:

1. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) को ‘मूल ढांचा’ घोषित करना

प्रस्तावना में बदलाव को खारिज: नवंबर 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष’ (Secular) और ‘समाजवादी’ शब्दों को हटाने की याचिकाओं को खारिज कर दिया।
  • महत्व: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये शब्द भारत के मूल सिद्धांतों का हिस्सा हैं और धर्मनिरपेक्षता संविधान के ‘मूल ढांचे’ का अभिन्न अंग है, जिसे संसद भी नहीं बदल सकती। 

2. नफरती भाषण (Hate Speech) पर ‘लोहे के हाथ’ की नीति

  • स्वत: संज्ञान (Suo Motu) कार्रवाई: कोर्ट ने आदेश दिया है कि पुलिस को हेट स्पीच के मामलों में बिना किसी शिकायत के तुरंत एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।
  • सांप्रदायिक सद्भाव: मई 2025 में कोर्ट ने कहा कि सांप्रदायिक नफरत फैलाने के किसी भी प्रयास से ‘लोहे के हाथ’ (Iron Hand) से निपटा जाना चाहिए, क्योंकि यह देश के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करता है। 

3. धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण और यथास्थिति

  • प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट (1991) पर रोक: दिसंबर 2024 और जनवरी 2026 के निर्देशों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को मौजूदा धार्मिक ढांचों के संबंध में नए सर्वेक्षण या अंतरिम आदेश पारित करने से अस्थायी रूप से रोक दिया है।
  • उद्देश्य: इसका लक्ष्य ऐतिहासिक विवादों के कारण समाज में पैदा होने वाले नए सांप्रदायिक तनावों को रोकना है। 

4. क्षेत्रीयता और राजनीति में धर्म का प्रयोग

  • वोटों के लिए धर्म का उपयोग: जुलाई 2025 में कोर्ट ने कहा कि राजनीति में क्षेत्रीयता और धर्म का उपयोग सांप्रदायिकता जितना ही खतरनाक है, क्योंकि ये दोनों ही देश की एकता को चुनौती देते हैं।
  • अदालती दस्तावेजों में सुधार: जनवरी 2025 में कोर्ट ने निर्देश दिया कि कानूनी कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ताओं या पक्षों की जाति या धर्म का उल्लेख अनावश्यक रूप से नहीं किया जाना चाहिए ताकि न्यायिक निष्पक्षता बनी रहे। 

5. दंगों की जांच में निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता

  • विशेष जांच टीम (SIT) का गठन: नवंबर 2025 में, महाराष्ट्र के अकोला सांप्रदायिक दंगों के मामले में कोर्ट ने निर्देश दिया कि SIT में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अधिकारी शामिल होने चाहिए ताकि जांच में पारदर्शिता और जनता का भरोसा बना रहे। 

6. दिल्ली दंगा केस (2026)

  • आतंकवादी कृत्य की श्रेणी: 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि सुनियोजित तरीके से अशांति और विभाजन पैदा करने वाले कृत्य ‘आतंकवादी कृत्य’ (UAPA के तहत) की श्रेणी में आ सकते हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक हैं। 
इन फैसलों के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि भारतीय संविधान किसी भी प्रकार की धार्मिक कट्टरता के ऊपर है और राष्ट्र की अखंडता के लिए ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’अनिवार्य है। 

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