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यह कथन कि “सुप्रीम कोर्ट द्वारा सक्रिय निर्वचन द्वारा नीति निर्देशक तत्वों को मूल अधिकार एवं सकारात्मक मानव अधिकारों के क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया” बिल्कुल सटीक है

। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (DPSP) की स्थिति को केवल गैर-प्रवर्तनीय आदर्शों से ऊपर उठाकर उन्हें नागरिकों के लिए प्रवर्तनीय अधिकारों के समान महत्वपूर्ण बना दिया है [

सर्वोच्च न्यायालय ने यह कार्य निम्नलिखित तरीकों से किया है:
  • व्यापक निर्वचन (Broad Interpretation): न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) जैसे मूल अधिकारों का सक्रिय रूप से विस्तार किया है। इस विस्तार में, उसने कई नीति निर्देशक तत्वों में निहित सिद्धांतों को शामिल किया है [1, 2]।
  • सामंजस्यपूर्ण निर्माण (Harmonious Construction):न्यायालय ने मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। यह माना गया है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं, और निदेशक तत्व मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं [1]।
  • सकारात्मक दायित्व (Positive Obligations):न्यायालय ने सरकार पर सकारात्मक दायित्व डाले हैं, जिसके तहत राज्य को नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठाने होंगे 
प्रमुख उदाहरण:
  • शिक्षा का अधिकार: अनुच्छेद 45 में निहित प्राथमिक शिक्षा के प्रावधान को उन्नीकृष्णन मामले में अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार घोषित किया गया। इसके बाद इसे 86वें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 21A के रूप में संविधान में जोड़ा गया ।
  • आजीविका का अधिकार: ओल्गा टेलिस मामले में, न्यायालय ने माना कि “जीवन के अधिकार” (अनुच्छेद 21) में गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका का अधिकार भी शामिल है, जो अनुच्छेद 39 (a) के सिद्धांतों को प्रभावी बनाता है ।
  • पर्यावरण संरक्षण: अनुच्छेद 48A में दिए गए पर्यावरण संरक्षण के निर्देश को भी अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ पर्यावरण में जीने के अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है 
इस प्रकार, न्यायिक सक्रियता ने नीति निदेशक तत्वों को भारतीय संवैधानिक कानून की एक गतिशील शक्ति में बदल दिया है, जिससे सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित हुआ है
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘न्यायिक सक्रियता’ और ‘सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत’ का उपयोग करते हुए कई नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) को मूल अधिकारों के समान दर्जा दिया है। प्रमुख निर्णयों का विस्तार निम्नलिखित है:

 

1. शिक्षा का अधिकार: उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993)

इस मामले में न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए अनुच्छेद 45 (जो 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का निर्देश देता है) को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का अभिन्न अंग माना।
  • निर्णय: न्यायालय ने कहा कि बिना शिक्षा के व्यक्ति गरिमापूर्ण जीवन नहीं जी सकता, इसलिए 14 वर्ष तक की शिक्षा एक ‘मूल अधिकार’ है।
  • प्रभाव: इसी निर्णय के कारण बाद में 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया, जिससे शिक्षा एक संवैधानिक मूल अधिकार बन गई।

2. आजीविका का अधिकार: ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (1985)

यह मामला मुख्य रूप से फुटपाथ पर रहने वाले लोगों (Pavement Dwellers) के अधिकारों से संबंधित था।
  • निर्णय: न्यायालय ने अनुच्छेद 39(a) (जीविका के पर्याप्त साधन) और अनुच्छेद 41 (काम का अधिकार) की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘जीवन के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) में ‘आजीविका का अधिकार’ भी शामिल है। यदि किसी व्यक्ति से उसकी आजीविका छीन ली जाती है, तो उसके जीवन का अधिकार भी समाप्त हो जाता है।

3. संतुलित संबंध: मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)

इस मामले ने मूल अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच के संघर्ष को हमेशा के लिए स्पष्ट कर दिया।
  • निर्णय: कोर्ट ने व्यवस्था दी कि भारतीय संविधान मूल अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन की आधारशिला पर खड़ा है। ये दोनों एक रथ के दो पहियों के समान हैं।
  • न्यायालय ने कहा कि संसद निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए मूल अधिकारों में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन वह संविधान के ‘मूल ढांचे’ को नष्ट नहीं कर सकती।

4. समान कार्य के लिए समान वेतन: रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982)

हालांकि ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ (अनुच्छेद 39(d)) सीधे तौर पर मूल अधिकार नहीं है, लेकिन कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 14 और 16 के साथ जोड़कर प्रवर्तनीय बना दिया।
  • निर्णय: न्यायालय ने माना कि यदि राज्य समान कार्य के लिए असमान वेतन देता है, तो यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन माना जाएगा।

5. पर्यावरण संरक्षण: एम.सी. मेहता मामले (विभिन्न वर्ष)

न्यायालय ने अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण) और 51A(g)(प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा) को अनुच्छेद 21 के साथ जोड़कर ‘स्वच्छ पर्यावरण में रहने के अधिकार’ को मूल अधिकार घोषित किया।
  • इसके तहत दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के लिए CNG का अनिवार्य उपयोग और गंगा प्रदूषण जैसे मामलों में कड़े निर्देश दिए गए।

6. निःशुल्क कानूनी सहायता: एम.एच. होसकोट बनाम महाराष्ट्र राज्य (1978)

न्यायालय ने अनुच्छेद 39A (समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता) को अनुच्छेद 21 के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया माना।
  • निर्णय: राज्य का यह कर्तव्य है कि वह उन कैदियों या नागरिकों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करे जो गरीबी के कारण वकील नहीं कर सकते।
इन निर्णयों से स्पष्ट है कि न्यायालय ने अनुच्छेद 37 की सीमाओं (कि DPSP न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं) को पार करते हुए उन्हें ‘मानवीय गरिमा’ के लिए अनिवार्य माना है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सक्रिय व्याख्या के माध्यम से राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत “सकारात्मक मानवाधिकारों” और “प्रवर्तनीय मूल अधिकारों” में बदल दिया है।

 

2026 के परिप्रेक्ष्य में, इन परिवर्तनों से संबंधित प्रमुख निर्णय विस्तार से निम्नलिखित हैं:

1. शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 45 से 21A) 

  • उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993): इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने माना कि 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा प्राप्त करना एक मूल अधिकार है। यह निर्णय अनुच्छेद 45 (DPSP) को अनुच्छेद 21 के साथ जोड़कर दिया गया था।
  • वर्तमान स्थिति (2026): यह अब 86वें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 21A के रूप में एक पूर्ण मौलिक अधिकार है। 

2. गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका (अनुच्छेद 39(a) से 21)

  • ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (1985): कोर्ट ने व्यवस्था दी कि “जीवन के अधिकार” में गरिमा के साथ जीने और जीविका का अधिकार भी शामिल है। यह अनुच्छेद 39(a) में निहित सिद्धांतों को कानूनी शक्ति प्रदान करता है।
  • 2025-26 के नवीनतम विकास: कोर्ट ने फुटपाथों पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा और अतिक्रमण मुक्त मार्ग को भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की सुरक्षा से जोड़ा है। 

3. पर्यावरण संरक्षण (अनुच्छेद 48A से 21)

  • एम.सी. मेहता मामले: न्यायालय ने कई निर्णयों में स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 48A (पर्यावरण की रक्षा) का पालन करना राज्य का सकारात्मक कर्तव्य है क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण के बिना अनुच्छेद 21 का अर्थ शून्य है।
  • अरावली पहाड़ियों पर निर्णय (नवंबर 2025): सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को विकास से ऊपर रखते हुए खनन के लिए कड़े ‘सस्टेनेबल प्लान’ को अनिवार्य बनाया, जो पर्यावरण की रक्षा के निर्देशक तत्व को प्रभावी बनाता है। 

4. निःशुल्क कानूनी सहायता (अनुच्छेद 39A से 21)

  • खत्री बनाम बिहार राज्य (1980): न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के लिए अनुच्छेद 39A (मुफ्त कानूनी सहायता) एक मौलिक आवश्यकता है।
  • हालिया अपडेट (2026): कोर्ट अब “डिजिटल अरेस्ट” और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे आधुनिक मामलों में भी कानूनी सहायता और सुरक्षा को अनुच्छेद 21 के व्यापक दायरे में देख रहा है। 

5. मौलिक अधिकारों और DPSP के बीच संतुलन

  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980): कोर्ट ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि संविधान की आधारशिला “मूल अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन” है।
  • चंपकम दोरईराजन बनाम मद्रास राज्य: हालांकि शुरुआत में मूल अधिकारों को वरीयता दी गई थी, लेकिन वर्तमान में न्यायपालिका दोनों को एक-दूसरे का पूरक मानती है। 

 न्यायिक सक्रियता ने निर्देशक तत्वों को मात्र “निर्देशों” से हटाकर “प्रवर्तनीय दायित्वों” में बदल दिया है, जिससे भारत में सामाजिक और आर्थिक न्याय की अवधारणा अधिक सुदृढ़ हुई है। 


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