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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 क्या है?

अनुच्छेद 12 (Article 12 in Hindi) भारत के संविधान में एक प्रावधान है जो संविधान में उल्लिखित “राज्य” शब्द को परिभाषित करता है। इसमें केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकार और राज्य विधानमंडल शामिल हैं। इन संस्थाओं के अलावा, कुछ स्थानीय प्राधिकरणों और अन्य प्राधिकरणों को भी संविधान के तहत “राज्य” माना जाता है।

  • वर्तमान सन्दर्भ में “राज्य” शब्द का तात्पर्य है
    • भारत की सरकार और संसद ,
    • प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल, और
    • भारत के क्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के तहत सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण।
  • संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12 से 35) के तहत मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई है। इसलिए, अनुच्छेद 12 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है क्योंकि यह मौलिक अधिकारों की प्रयोज्यता निर्धारित करता है।

  • मौलिक अधिकार राज्य के विरुद्ध लागू करने योग्य हैं। यह निजी व्यक्तियों या संस्थाओं के विरुद्ध लागू करने योग्य नहीं है।

  • अनुच्छेद 12 में “राज्य” की परिभाषा महत्वपूर्ण है।
    • भारतीय न्यायपालिका द्वारा कई ऐतिहासिक निर्णयों में इसका उल्लेख किया गया है।
    • यह भारत में मौलिक अधिकारों और उनके प्रवर्तन का दायरा निर्धारित करता है।
    • इसका उपयोग राज्य की कार्रवाई के विरुद्ध नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया है।
  • “स्थानीय या अन्य प्राधिकारी” शब्द वर्षों से न्यायपालिका द्वारा विभिन्न व्याख्याओं का विषय रहा है। वाक्यांश “अन्य प्राधिकारी” की निम्नलिखित को शामिल करने के लिए व्यापक रूप से व्याख्या की गई है:
    • संस्थाएँ जो सार्वजनिक कार्य करती हैं और
    • वे संस्थाएँ जो सरकार के नियंत्रण के अधीन हैं।
  • यह व्याख्या ऐसी संस्थाओं के लिए मौलिक अधिकारों की प्रयोज्यता निर्धारित करने में मदद करती है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 ‘राज्य’ (State) की परिभाषा देता है, जिसके खिलाफ मौलिक अधिकारों के हनन पर (अनुच्छेद 32/226 के तहत) रिट याचिका दायर की जा सकती है। इसमें शामिल हैं: भारत सरकार/संसद, राज्य सरकार/विधानमंडल, स्थानीय प्राधिकरण (नगरपालिका, पंचायत) और अन्य प्राधिकारी (सरकारी नियंत्रण वाले वैधानिक/गैर-वैधानिक निकाय)।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख मामलों (Case Laws) के माध्यम से समझें:
  • अन्य प्राधिकरण” का दायरा (राजस्थान राज्य बिजली बोर्ड बनाम मोहन लाल, 1967): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘अन्य प्राधिकरण’ में वे सभी संस्थाएं शामिल हैं जो संविधान या कानून द्वारा गठित हैं और जिन्हें कानून बनाने या कार्यपालक आदेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
  • राज्य का परीक्षण (अजय हासिया बनाम खालिद मुजीब, 1981): कोर्ट ने तय किया कि अगर कोई संस्था (जैसे- सोसायटी, निगम) वित्तीय, प्रशासनिक और कार्यात्मक रूप से सरकार के व्यापक नियंत्रण में है, तो वह ‘राज्य’ है, चाहे वह कंपनी अधिनियम के तहत ही क्यों न बनी हो।
  • न्यायपालिका और राज्य (ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक, 1988): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका जब ‘न्यायिक’ कार्य करती है, तो राज्य नहीं है, लेकिन जब ‘प्रशासनिक’ कार्य करती है, तो वह अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा में आती है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती।
  • बीसीसीआई (BCCI) मामला (जी. मोहनराव बनाम बीसीसीआई): कोर्ट ने माना कि बीसीसीआई राज्य नहीं है क्योंकि यह सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं है, हालांकि यह सार्वजनिक कर्तव्य निभाती है (यह मुद्दा अभी भी चर्चा का विषय है)।
  • निजी संस्थाएं: आम तौर पर, निजी व्यक्तियों या कंपनियों के खिलाफ रिट नहीं डाली जा सकती, जब तक कि वे सरकार के ‘एजेंट’ के रूप में काम न कर रहे हों।

 अनुच्छेद 12 का अर्थ व्यापक है, जो सरकारी नियंत्रण वाली संस्थाओं को मौलिक अधिकारों के प्रति जवाबदेह बनाता है।

अनुच्छेद 12 और रिट क्षेत्राधिकार पर प्रमुख न्यायिक फैसले :

रिट क्षेत्राधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायालयीन निर्णय

1. अनुच्छेद 12 और इसकी परिभाषा का परिचय (Introduction to Article 12 and Its Definition) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 “राज्य” (State) की परिभाषा देता है, जिसमें भारत सरकार और संसद, हर राज्य की सरकार और विधानमंडल, और भारत सरकार के नियंत्रण में आने वाले सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण शामिल हैं।
यह परिभाषा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यह तय करती है कि नागरिक किन संस्थाओं के खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए और अनुच्छेद 226 के तहत व्यापक रिट क्षेत्राधिकार के लिए न्यायालय में जा सकते हैं।
2. अंडी मुकता सद्गुरु मामला: अनुच्छेद 226 के दायरे का विस्तार (Broadening of Article 226 in Andi Mukta Sadguru Case) Andi Mukta Sadguru Shree Muktajee Vandas Swami Suvarna Jayanti Mahotsav Smarak Trust बनाम V.R. Rudani मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह विचार किया कि क्या रिट एक गैर-वैधानिक (Non-statutory) संस्था के खिलाफ जारी की जा सकती है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि रिट क्षेत्राधिकार लागू करने के लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित संस्था कोई सार्वजनिक कर्तव्य (Public Duty) या कार्य कर रही है या नहीं।
• सार्वजनिक कर्तव्य पर जोर (Emphasis on Public Duty): रिट न केवल वैधानिक निकायों पर बल्कि किसी भी संस्था पर लागू हो सकती है जो सार्वजनिक कार्य कर रही हो।
• शैक्षणिक संस्थानों का प्रभाव (Impact on Educational Institutions): क्योंकि ट्रस्ट को सार्वजनिक निधि मिलती थी और वह एक शैक्षणिक संस्थान चलाता था, इसे सार्वजनिक कर्तव्यों में संलग्न पाया गया और इसे रिट क्षेत्राधिकार में शामिल किया गया।
3. ज़ी टेलीफिल्म्स मामला: अनुच्छेद 12 की सीमाओं की परीक्षा (Testing the Limits of Article 12 in Zee Telefilms Case) Zee Telefilms Ltd. बनाम Union of India मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह सवाल उठाया कि क्या भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) को अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” माना जा सकता है।
अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि BCCI को “राज्य” नहीं माना जा सकता, लेकिन यह सार्वजनिक कर्तव्य निभाता है, जिससे इसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत लाया जा सकता है।
• सार्वजनिक कार्य सिद्धांत (Public Function Doctrine): यदि एक निजी निकाय (Private Body) सरकारी कार्यों के समान कार्य करता है, तो वह जवाबदेह हो सकता है। •
उपलब्ध उपचार (Available Remedies): अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भले ही अनुच्छेद 32 के तहत राहत उपलब्ध न हो, प्रभावित पक्ष अनुच्छेद 226 के तहत उपचार प्राप्त कर सकते हैं।
4. अनुच्छेद 226 के संदर्भ में न्यायिक पुनर्विचार (Judicial Review in the Context of Article 226) Janet Jeyapaul बनाम SRM University और अन्य मामले ने उन सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की जो सार्वजनिक कार्य करने वाले निकायों पर रिट क्षेत्राधिकार लागू करते हैं।
यह मामला विशेष रूप से इस बात पर था कि क्या एक “माने हुए विश्वविद्यालय” (Deemed University) को अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है।
• माना हुआ विश्वविद्यालय (Deemed University Status): SRM विश्वविद्यालय, जिसे UGC अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त थी, उच्च शिक्षा प्रदान करने के सार्वजनिक कार्य में संलग्न था।
• अनुच्छेद 226 का अनुप्रयोग (Application of Article 226): अदालत ने कहा कि यदि किसी संस्था की गतिविधियाँ सार्वजनिक हित से संबंधित हैं, तो वह रिट क्षेत्राधिकार में आ सकती है।
5. अजय हसिया मामला: “अन्य प्राधिकरण” की परिभाषा (Ajay Hasia Case: Defining “Other Authorities”) Ajay Hasia बनाम Khalid Mujib Sehravardi मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 12 के तहत “अन्य प्राधिकरण” क्या होते हैं। अदालत ने यह मापदंड स्थापित किया:
• वित्तीय सहायता की सीमा (Extent of Financial Assistance): यदि संस्था को सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलती है। • सरकारी नियंत्रण (Government Control): यदि संस्था पर सरकार का व्यापक नियंत्रण है।
• सार्वजनिक महत्व (Public Importance): यदि संस्था का कार्य सार्वजनिक महत्व का है। यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि जैसे विश्वविद्यालय जैसे संस्थान, जो सार्वजनिक कार्य करते हैं, अनुच्छेद 12 के तहत चुनौती देने के लिए उपयुक्त हैं।
6. डाटाफिन सिद्धांत और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव (Datafin Principle and International Influence) Janet Jeyapaul मामले में अदालत ने अंग्रेजी न्यायशास्त्र जैसे R. बनाम Panel on Take-overs and Mergers, ex parte Datafin Plc का हवाला दिया।
इस सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी निजी निकाय का कार्य सार्वजनिक प्रभाव डालता है, तो वह न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकता है। इससे यह दृष्टिकोण मजबूत हुआ कि संस्था का रूप नहीं बल्कि उसके कार्य की प्रकृति महत्वपूर्ण है।
7. सार्वजनिक कार्य की भूमिका (Role of Public Function in Defining Jurisdiction) अदालतों ने बार-बार कहा है कि सार्वजनिक कार्य रिट क्षेत्राधिकार की मान्यता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि कोई निजी या गैर-वैधानिक निकाय सार्वजनिक अधिकारों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में संलग्न है, तो वह अनुच्छेद 226 के तहत जवाबदेह हो सकता है। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक कल्याण को प्रभावित करने वाले सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक उत्तरदायित्व बना रहे।
भारतीय न्यायपालिका ने अनुच्छेद 12 और अनुच्छेद 226 के रिट क्षेत्राधिकार के दायरे को धीरे-धीरे विस्तारित किया है ताकि सार्वजनिक कार्यों में संलग्न विभिन्न निकायों को शामिल किया जा सके।

Andi Mukta Sadguru, Zee Telefilms, और Ajay Hasia जैसे प्रमुख फैसलों ने यह सुनिश्चित किया है कि सार्वजनिक कर्तव्यों में संलग्न राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं के खिलाफ अधिकारों के प्रवर्तन के लिए लचीले रूप से अनुच्छेद 12 की व्याख्या की जा सके।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’

अनुच्छेद 12 संविधान के भाग III के विभिन्न अनुच्छेदों में प्रयुक्त “राज्य” शब्द को परिभाषित करता है। इसमें कहा गया है कि जब तक संदर्भ अन्यथा अपेक्षित न हो, “राज्य” शब्द में निम्नलिखित शामिल हैं: –

  • भारत की सरकार और संसद, अर्थात् संघ की कार्यपालिका और विधायिका।
  • प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल , अर्थात् राज्यों की कार्यपालिका और विधानमंडल
  • भारत के भूभाग के भीतर स्थित सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण
  • भारत सरकार के नियंत्रण में सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकरण

इस प्रकार, “राज्य” शब्द में संघ और राज्यों के कार्यकारी और विधायी दोनों अंग शामिल हैं। अतः, इन्हीं निकायों के कार्यों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती है ।

  • अनुच्छेद 12 के संदर्भ में, “प्राधिकार” शब्द का अर्थ है कानून, आदेश, नियम, उपनियम, अधिसूचना आदि बनाने की शक्ति, जिनमें कानून का बल होता है और उन कानूनों को लागू करने की शक्ति।

स्थानीय प्राधिकरण शब्द में शामिल हैं

  • “स्थानीय प्राधिकरण” शब्द में नगरपालिकाएं, जिला बोर्ड, पंचायतें, सुधार ट्रस्ट और  बंदोबस्ती बोर्ड जैसे प्राधिकरण शामिल हैं।

न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित परीक्षण निर्धारित किए कि कोई निकाय सरकार की एजेंसी या साधन है या नहीं: – (आरडी शेट्टी मामला)

  1. राज्य के वित्तीय संसाधन ही मुख्य वित्तपोषण स्रोत हैं, अर्थात् निगम की संपूर्ण शेयर पूंजी सरकार के पास है।
  2. व्यापक और गहन राज्य नियंत्रण का अस्तित्व
  3. इसका कार्यात्मक स्वरूप मूल रूप से सरकारी है, अर्थात् निगम के कार्य सार्वजनिक महत्व के हैं और सरकारी कार्यों से निकटता से संबंधित हैं।
  4. सरकार का एक विभाग एक निगम को हस्तांतरित कर दिया जाता है।
  5. चाहे निगम को राज्य द्वारा प्रदत्त या राज्य द्वारा संरक्षित एकाधिकार का दर्जा प्राप्त हो।

हालांकि, न्यायालय ने इन परीक्षणों को निर्णायक नहीं बल्कि केवल उदाहरण के तौर पर माना और कहा कि इनका उपयोग सावधानी और सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए। 

भारत सरकार के नियंत्रण में आने वाले प्राधिकरणों से तात्पर्य निम्नलिखित से है:

  • इसमें राज्य की परिभाषा के अंतर्गत भारतीय क्षेत्र से बाहर के वे सभी क्षेत्र शामिल हैं, जो भारत सरकार के नियंत्रण में हैं या आ सकते हैं, जैसे कि अधिदेशित या न्यास क्षेत्र। 
  • अंतर्राष्ट्रीय समझौते के तहत ऐसा क्षेत्र भारत के नियंत्रण में आ सकता है। अतः, ऐसे क्षेत्र भी भाग III के अधीन होंगे और इन क्षेत्रों के निवासी भी भाग III में निहित मौलिक अधिकारों का लाभ उठा सकते हैं। 
  • भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड का मामला –
    • अदालत ने कहा कि बीसीसीआई आरडी शेट्टी मामले में परिभाषित राज्य के मापदंडों को पूरा नहीं कर रहा था।

न्यायपालिका को “राज्य” शब्द में समाहित किया गया है (अनुच्छेद 12):

एआर अंतुले बनाम आरएस नायक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले में कहा कि न्यायालय ऐसा कोई आदेश पारित या निर्देश जारी नहीं कर सकता जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

अतः यह कहा जा सकता है कि संविधान के अनुच्छेद 12 में परिभाषित “राज्य” शब्द में न्यायपालिका भी शामिल है। लेकिन न्यायिक कार्यों के लिए नहीं, बल्कि केवल प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए।


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