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निजीकरण के माध्यम से सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे आवश्यक क्षेत्रों से हटकर अपने संवैधानिक कल्याणकारी दायित्वों (अनुच्छेद 14, 21, 39) को कम कर रही है। यह दृष्टिकोण सामाजिक न्याय के बजाय लाभ पर केंद्रित है, जिससे कमजोर वर्गों के लिए सेवाओं की सुलभता कम हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि निजीकरण के बावजूद, सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य बना रहता है

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों/सिद्धांतों से समझें:
  • सकारात्मक क्रिया (Affirmative Action) और सामाजिक न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि निजीकरण का अर्थ सरकार की जिम्मेदारी खत्म होना नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में, जहाँ सरकार की सकारात्मक भूमिका (समान अवसर प्रदान करना) अपेक्षित है, वहां निजीकरण के बावजूद सरकार को इन तक पहुँच (Access) सुनिश्चित करनी होगी।
  • सार्वजनिक संपत्ति का प्रबंधन: न्यायालय ने सार्वजनिक संपत्तियों (Public Assets) के निजी हाथों में जाने पर चिंता जताई है। कोर्ट के अनुसार, यदि निजीकरण जन कल्याण (Public Welfare) के बजाय केवल निजी लाभ के लिए किया जा रहा है, तो यह अनुच्छेद 39(b) और (c) (संसाधनों के वितरण) का उल्लंघन हो सकता है, जो राज्य को निर्देश देता है कि वह संसाधनों का उपयोग आम भलाई के लिए करे।
  • राज्य की जवाबदेही: निजीकरण के बावजूद, यदि कोई निजी संस्था सरकारी कार्यों का निर्वहन कर रही है, तो वह भी संवैधानिक जवाबदेही (Constitutional Accountability) के दायरे में आ सकती है। सरकार इन कार्यों को आउटसोर्स कर सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी (Accountability) उसी की रहती है।
निजीकरण का समानता के अधिकारों (अनुच्छेद 14-16) पर मिश्रित प्रभाव पड़ा है, जहाँ अवसर तो बढ़े हैं लेकिन आरक्षण और रोजगार सुरक्षा में कमी आई है। सुप्रीम कोर्ट ने निजीकरण को आर्थिक नीति का मामला माना है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया है कि निजी संस्थाएं भी समावेशी (Inclusive) नीतियों (जैसे- दिव्यांगों के लिए समान अवसर) को लागू करने के लिए उत्तरदायी हैं।
निजीकरण और समानता के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश:
  • निजी निकायों पर भी समावेशी नीतियां (2020-21): सुप्रीम कोर्ट ने जेन कौशिक  मामले में कहा कि निजी संस्थाओं को भी ‘समान अवसर नीति’ (EOP) का पालन करना होगा और ट्रांस-इन्क्लूसिव पॉलिसी (ट्रांसजेंडर समानता) बनानी होगी।
  • अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा (BALCO मामला, 2008): कोर्ट ने कहा कि निजीकरण के बाद निजी संस्थाएं आमतौर पर अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं रहती हैं, जिससे वे रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) से बाहर हो जाती हैं।
  • दिव्यांग अधिकार (2021): विकेश कुमार बनाम यूपीपीएससी  में, कोर्ट ने कहा कि राज्य के दायित्व केवल भेदभाव न करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समावेश (Inclusion) के लिए उचित सुविधाएं (Reasonable Accommodations) प्रदान करना भी आवश्यक है, जो निजी क्षेत्र पर भी लागू हो सकता है।
  • मनमानी के विरुद्ध समानता (2021): पानी राम बनाम भारत संघ  मामले में, कोर्ट ने कहा कि कानून के सामने समानता का अधिकार तब भी लागू होगा जब व्यक्ति के पास कोई सार्थक विकल्प न हो, भले ही वह निजी अनुबंध के तहत हो।
  • निजी संपत्ति का पुनर्वितरण (2024): कोर्ट ने रेखांकित किया कि निजी संपत्ति के अधिग्रहण के समय सामाजिक न्याय और सार्वजनिक कल्याण के बीच संतुलन होना चाहिए (अनुच्छेद 39(बी))।
मुख्य प्रभाव:
  1. आरक्षण में कमी: निजीकरण से अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सुविधा कम हो जाती है, जो समानता के संवैधानिक लक्ष्य के लिए एक चुनौती है।
  2. रोजगार की स्थिति: निजी क्षेत्र में कार्यकुशलता (Efficiency) बढ़ती है, लेकिन नौकरी की सुरक्षा और समान वेतन में असमानता आ सकती है।
  3. संवैधानिक दायित्व: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आर्थिक सुधारों (निजीकरण) का अर्थ यह नहीं है कि संवैधानिक मूल्यों और समानता के सिद्धांत से समझौता किया जाए।
 सुप्रीम कोर्ट निजी क्षेत्र में सामाजिक समानता और समावेशिता को बनाए रखने के लिए कानूनी ढांचे का उपयोग कर रहा है।


निजीकरण एक आर्थिक नीति हो सकती है, लेकिन इसे सरकारी प्राथमिकताओं—विशेषकर पिछड़े और गरीब वर्गों को बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने—के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि निजीकरण की आड़ में सरकार कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के अपने मूल सिद्धांत से मुक्त नहीं हो सकती।


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