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मध्यप्रदेश विधानसभा ने 21 जुलाई 2026 को समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक ध्वनि मत से पारित कर दिया है
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भाजपा सरकार द्वारा लाए गए इस ऐतिहासिक विधेयक का विपक्ष (कांग्रेस) ने कड़ा विरोध किया, लेकिन सरकार ने इसे ध्वनिमत के बहुमत से पास करा लिया। राज्यपाल और राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के बाद यह पूरे राज्य में पूर्ण रूप से लागू हो जाएगा।
इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली 6 सदस्यीय समिति ने तैयार किया है।
📋 विधेयक के मुख्य नियम और प्रावधान
  • बहुविवाह पर पूरी रोक: राज्य में रहने वाले किसी भी नागरिक को एक जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी करने की अनुमति नहीं होगी। तीन तलाक और निकाह हलाला को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दंडनीय बनाया गया है।
  • लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को 1 महीने के भीतर अपना पंजीकरण (Registration) कराना अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने पर 3 महीने तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान है。 यदि पार्टनर की उम्र 21 वर्ष से कम है, तो इसकी सूचना उनके माता-पिता और स्थानीय पुलिस को दी जाएगी।
  • विवाह और तलाक के नियम: सभी धर्मों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। ग्राम पंचायत से लेकर नगर निगम स्तर तक विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा और तलाक केवल कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही मान्य होगा।
  • संपत्ति में समान अधिकार: पैतृक और अर्जित संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में पुत्र और पुत्री (बेटे-बेटी) दोनों को बिल्कुल समान अधिकार मिलेंगे।
  • बच्चों को कानूनी संरक्षण: शादी, लिव-इन, सरोगेसी या आईवीएफ (IVF) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा और संपत्ति का अधिकार मिलेगा। ‘अवैध संतान’ (Illegitimate child) शब्द को पूरी तरह हटा दिया गया है।
  • आदिवासी समाज को छूट: मध्यप्रदेश की 21% आदिवासी (Scheduled Tribes) आबादी और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) को उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
📊 राज्यों की स्थिति में मध्यप्रदेश का स्थान
इस कानून को पारित करने के साथ ही मध्यप्रदेश देश का चौथा राज्य बन गया है जिसने अपनी विधानसभा में समान नागरिक संहिता बिल पास किया है (इससे पहले गोवा, उत्तराखंड, गुजरात और असम इस दिशा में कानून बना चुके हैं)।

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